रेखा बायोग्राफी, रेखा बायो हिंदी में, 36 साल बाद राज खुल गया, एक्ट्रेस रेखा लेस्बियन हैं?

हम भूल गए रे हर बार मगर तेरा प्यार नहीं। आज यह दास्तान है भारतीय हिंदी सिनेमा के सुनहरे गुजरते दौर की एक ऐसी नायिका की जिसकी मनमोहक सांवली सलोनी सूरत की खूबसूरती ने हिंदी सिनेमा के साथ-साथ बड़े-बड़े फिल्म अभिनेताओं और फिल्म निर्माताओं के ऊपर वो जादू चलाया कि यह अभिनेत्री बन गई। सबके दिलों की धड़कन हंसते हंसते रस्ते जिंदगी यू ही हजारों लाखों दिलों की पहली पसंद बनी यह महान अभिनेत्री कैसे भारतीय हिंदी सिनेमा का वो नाम और मुकाम बन गई जिसकी चाहत में इनके साथ की दूसरी मशहूर नायिकाएं रह गई इनसे कोसों दूर। दोस्तों, यह महान नायिका अपने शानदार और दमदार अभिनय की बदौलत 80 के दौर में कैसे

बन गई हिंदी सिनेमा की सबसे चर्चित, लोकप्रिय और महंगी अदाकारा। गुम है किसी के प्यार में। दिल सुबह। दोस्तों इतनी खूबसूरत और लोकप्रिय अभिनेत्री की जिंदगी में ऐसा क्या हुआ था कि इस अभिनेत्री की मां को तलाकशुदा होने के बावजूद हो गया था दो-दो मर्दों से नाजायज प्यार और कैसे आगे चलकर उसी नाजायज प्रेम संबंधों के चलते इस अभिनेत्री की मां को जन्म देना पड़ा था दो-दो नाजायज संतानों को। बस बस बंद करो। अब मैं और बर्दाश्त नहीं कर सकती। दोस्तों, क्यों इस अभिनेत्री को अपने बचपन के दिनों से, अपने माता-पिता की वजह से झेलनी पड़ी वो आलोचना और अपमान की आग जिसकी लौ में जलकर खाक हो गया इस अभिनेत्री का पूरा मासूम सा

बचपन। आज उस अभिनेत्री की जहां पूरी दुनिया दीवानी है। वो अभिनेत्री क्यों कभी भी नहीं बनना चाहती थी, किसी भी सिल्वर स्क्रीन की अदाकारा। पर इन माय केस ऐसा नहीं है। मैं कभी नहीं चाहती थी कि मैं एक्ट्रेस बनूं। मुझे तो मार मार के बनाएगा। दोस्तों इस अदाकारा की जिंदगी में ऐसा क्या हुआ था कि इस नायिका को अपने परिवार की खातिर घर गृहस्ती को चलाने के लिए रखना पड़ा था बाल अवस्था में सिनेमा की चौखट पर कदम। इन माय केस मैं बहुत छोटी थी जब मैं आई थी तो मैं चाइल्ड आर्टिस्ट थी। 3 साल की उम्र से मैं काम कर रही हूं। दोस्तों और क्या आप जानते हैं कि अपने रंग रूप से काली मोटी और भद्दी दिखने वाली यह अभिनेत्री आगे चलकर कैसे बन गई हिंदी और साउथ सिनेमा की सबसे खूबसूरत और आकर्षित हीरोइन।

[संगीत] क्या आप जानते हैं कि इस अदाकारा की खूबसूरत जिंदगी का वो कौन सा श्राप मिला था इसे? जिसकी वजह से यह अदाकारा चार शादियां और छह प्रेम संबंधों में बंधे होने के बावजूद आज भी है अकेली तन्हा और विधवा जिंदगी रोज नए रंग जिंदगी के दुख के भंवर में फंसी ये अभिनेत्री दो-दो पतियों के विधवा होने के बावजूद आज भी क्यों और किसके नाम का लगाती है अपनी मांग में सुहागिन का सिंदूर। तुम एक दिल में नहीं। हजारों दिलों में एक साथ बसना चाहती थी इसीलिए। इसलिए आज ना तो तुम किसी की मां हो ना ही किसी की पत्नी। दोस्तों कैसे इस नायिका की वजह से मशहूर फिल्म अभिनेता अमिताभ बच्चन और उनकी पत्नी जया बच्चन की जिंदगी में लग गई वो आग जिसकी धक में आज तक जल रहा है पूरा बच्चन परिवार। क्यों इस अभिनेत्री की वजह से अमिताभ बच्चन देना चाहते थे जया बच्चन को तलाक? क्यों मेरा घर तबाह कर रही हैं? अपना घर भी तो भूक रही हूं। और दोस्तों क्या आप यह जानते हैं कि इस अभिनेत्री की वजह से भारतीय

हिंदी सिनेमा में बर्बाद हो गए कई घर और उन्हीं बर्बाद हुए घरों की एक महान खूबसूरत अभिनेत्री ने क्यों कह दिया था इस अदाकारा को राष्ट्रीय चुड़ैल? क्या आप जानते हैं कि ये अभिनेत्री चार-चार शादी अनेकों प्रेम संबंध होने के बावजूद कैसे बन गई समलैंगिक? क्या है इनकी समलैंगिक जिंदगी के पीछे का वो काला सच जिसे आज तक दुनिया की नजरों से छिपाया गया। मन क्यों बहका रे बहका आधी रात को। पूरा सच जानने के लिए आप बने रहिए हमारे साथ इस वीडियो के अंत तक। जहां हम आपको बताने वाले हैं इस अभिनेत्री की जिंदगी का वो सच जिसे जानकर निकल जाएगी सभी के पैरों तले जमीन। जिंदगी में दूर तक फैली है तनहा। नमस्कार आदाब आभार दोस्तों आज हम अपने इस शो में बात करने जा रहे हैं एक ऐसी खूबसूरत जिंदगी की मल्लिका और अदाकारा की जिसने अपने शानदार और यादगार अभिनय के दम पर पूरी दुनिया में वो मुकाम और ऊंचाई हासिल की जिसको आज तक बड़े ही मानसान के साथ उनके चाहने वाले याद करते हैं। इस अभिनेत्री ने

भारतीय हिंदी सिनेमा में अपने अभिनय और विवादों की वो छाप छोड़ी कि आज एक दौर गुजर जाने के बाद भी इस अभिनेत्री को पहचाना गया भानु रेखा गणेशन यानी हम सबके दिलों की धड़कन खूबसूरत रेखा के नाम से। तेरे बिना जिया जाए ना। [संगीत] कौन थी रेखा? कहां से आई थी? किस परिवार से यह ताल्लुक रखती हैं? क्या थे इनकी जिंदगी के वो राज और विवाद जिनकी वजह से आज भी हैं यह चर्चा में। मैं आपको रेखा से जुड़े हर उस राज के बारे में बताऊंगी। लेकिन उससे पहले एक नजर डाल लेते हैं रेखा के शुरुआती जीवन और पढ़ाई लिखाई पर। आपकी आंखों में कुछ महके हुए नमस्कार आप सभी का स्वागत है बॉलीवुड नवेल के इस एपिसोड में। कान में झुमका चाल में ठुमका कमर पे चोटी लटके हो गया दिल का पुरजा। रेखा का जन्म 10 अक्टूबर साल 1954 को तमिलनाडु चेन्नई में हुआ था। रेखा का पूरा नाम भानु रेखा गणेशन है। रेखा की मां का नाम पुष्पावली और पिता का नाम जैेमिनी गणेशन है। रेखा के माता-पिता भी तेलुगु सिनेमा के सुपरस्टार्स थे। तो रात के मुसाफिर चंदा जरा बता दे। दोस्तों हम रेखा के जीवन के बारे में

आपको सब कुछ बताएं। उससे पहले रेखा की मां और पिता के आपसी रिश्ते के बारे में जानना बहुत जरूरी है क्योंकि इस रिश्ते को जाने बिना रेखा की जिंदगी को समझ पाना मुश्किल है। रेखा के परिवार की जिंदगी शुरू होती है मद्रास की शान जैेमिनी स्टूडियो से। इस स्टूडियो के मालिक थे एस एस वासन साहब और एस एस वासन साहब की उन दिनों एक मशहूर अभिनेत्री हुआ करती थी उनका नाम था पुष्पावली। वासन जी पहले से ही शादीशुदा थे तो वहीं पुष्पावली भी पहले से शादीशुदा थी और दो बच्चों की मां थी। एस एस वासन और पुष्पावली दोनों एक दूसरे के बेहद करीब थे। एस एस वासन पुष्पावली को बहुत प्यार करते थे। वो पुष्पावली को सब कुछ देना चाहते थे। लेकिन नहीं देना चाहते थे तो वह था एक पत्नी का दर्जा। और वहीं दूसरी तरफ तलाकशुदा पुष्पावली अपने इस रिश्ते को एक नाम देना चाहती थी। लेकिन उनको पत्नी का दर्जा नहीं मिल रहा था और यह बात पुष्पावली को हर रोज अंदर ही अंदर खाई जा रही थी। इसी कशमकश के बीच एक दिन पुष्पावली की एक फिल्म रिलीज हो रही थी जिसका नाम मिस मालिनी था और इसी फिल्म में एक छोटा सा रोल निभा रहे थे रामस्वामी गणेशन।

रामस्वामी गणेशन और पुष्पावली की इसी फिल्म के सेट पर मुलाकात हुई। ये मुलाकातें कब प्यार में बदल गई यह दोनों को ही नहीं पता चला। रामास्वामी के साथ पुष्पावली अब अपने भविष्य के हसीन और खूबसूरत सपने देखने लगी थी। लेकिन इन दोनों की यह नजदीकी एस एस वासन को कहीं ना कहीं खटक रही थी। एस एस वासन उन दिनों एक हिंदी फिल्म इंसानियत बनाने का विचार कर रहे थे। इस फिल्म में दिलीप कुमार और देवानंद हीरो थे और इन दोनों की हीरोइन बनने वाली थी पुष्पावली। एस एस वासन को पता था कि पुष्पावली का सपना था कि वह हिंदी सिनेमा की अभिनेत्री बनकर उस पर राज करें। लेकिन पुष्पावली के सपने के बीच आ गई एस एस वासन की गंदी नियत और इसी नियत के चलते एस एस वासन ने पुष्पावली से अपने हिंदी फिल्म इंसानियत और रामास्वामी गणेशन में से किसी एक को चुनने के लिए कहा। प्यार में पूरी तरह डूबी पुष्पावली ने फिल्म को छोड़ दिया और अपने प्यार रामास्वामी गणेशन को चुन लिया। हालांकि उन दिनों रामास्वामी गणेशन कोई बड़े एक्टर नहीं थे। जबकि पुष्पावली एक ऊंचे दर्जे की महिला एक्ट्रेस थी और पुष्पावली ने रामास्वामी के साथ जैेमिनी स्टूडियो को अलविदा कह

दिया। रामास्वामी ने पुष्पावली के साथ सब कुछ छोड़ा लेकिन नहीं छोड़ा था जैेमिनी स्टूडियो का नाम। लिहाजा रामास्वामी ने अपने नाम के आगे से रामास्वामी हटाकर लगा लिया जैमिनी और इस तरह से यह बन गए जैमिनी गणेशन और अपनी मेहनत और किस्मत से कुछ ही समय बाद जैमिनी की फिल्में शानदार प्रदर्शन करने लगी और यह बन गए साउथ इंडस्ट्री के नए सुपरस्टार और अब इस कामयाबी के साथ ही अब पुष्पावली सोचने लगी जैेमिनी और अपनी शादी की बात लेकिन यहां यह बात गौर गौर करने की है कि जैेमिनी गणेशन भी पहले से ही शादीशुदा थे और जैेमिनी ने भी कामयाबी पाने के लिए पुष्पावली को पत्नी का दर्जा देने से इंकार कर दिया। यह सब कुछ जानकर पुष्पावली एक बार फिर अपना सब कुछ हार गई। वह अंदर तक टूट गई। गणेश पुष्पावली को पत्नी तो मानते थे लेकिन दुनिया के सामने पत्नी का सम्मान नहीं देते थे। पुष्पावली की किस्मत ना जाने उनसे किस जन्म का बदला ले रही थी। इनकी जिंदगी में प्यार करने वाले तो थे लेकिन पत्नी का दर्जा देने वाले नहीं। कैसी है दुनिया हमने ना जाना। अपने और गणेशन के रिश्ते में पुष्पावली ने साल 1954 की 10 अक्टूबर को एक बेटी को जन्म दिया जिसका नाम रखा भानु रेखा गणेशन। रेखा के नाम के आगे गणेशन तो जुड़ गया लेकिन इनको दुनिया वालों ने गणेशन की नाजायज प्रेम संबंध की

नाजायज संतान माना। क्योंकि गणेशन और रेखा की मां पुष्पावली का यह रिश्ता अभी तक एक नाजायज रिश्ते की डोर से बंधा था और इस नाजायज रिश्ते और संतान के जन्म ने उस वक्त न्यूज़पेपर और मैगजींस के कई पेज भर दिए थे और इन सबके बीच पुष्पावली के जख्म और गहरे होते चले गए और इस तरह से जैमिनी और पुष्पावली की नाजायज रिश्ते की दरारें और बढ़ती चली गई। रेखा के बाद पुष्पावली ने एक और नाजायज बेटी को जन्म दिया जिसका नाम राधा रखा गया। दो-दो बेटियों के नाजायज पिता बनने के बाद भी जैमिनी गणेशन ने कभी भी पुष्पावली और अपने रिश्ते को कोई नाम नहीं दिया। बेटियों के जन्म के बाद जैमिनी ने पुष्पावली के घर आना-जाना बिल्कुल बंद सा ही कर दिया और इसी दुख के समय में भानु रेखा भी बड़ी हो रही थी और भानु रेखा भी समझने लगी थी उनके पिता जैमिनी गणेशन और भी कई बच्चों के पिता हैं और वह हमको अब पसंद नहीं करते हैं। जैमिनी गणेशन की इस बेरुखी ने पुष्पावली को घुटनों पर ला खड़ा किया और उधर मासूम सी भानु रेखा अपनी मां को हर रोज तड़पते और रोते आंसुओं को

बहाते देखती और इस सबके बीच भानु रेखा अपनी मां के बेहद करीब आ गई। पुष्पावली अपनी बेटियों की देखभाल के लिए अब फिल्मों में छोटा-मोटा अभिनय कर लिया करती। लेकिन बढ़ती उम्र के साथ यह रोल भी मिलने बंद हो गए। भानु रेखा जब 4 साल की थी, तो अपनी मां की वजह से उन्हें बाल कलाकार के रूप में फिल्म इति गुट्टो में काम करने का मौका मिला था और यह फिल्म साल 1958 में रिलीज हुई। इसके बाद भानु रेखा साल 1966 में रंगुला रत्नम में भानु रेखा ने काम किया। वेली डिंभि नार गुजरते समय में पुष्पावली के लिए घर का खर्चा चलाना बड़ा मुश्किल होता जा रहा था। उनको समझ ही नहीं आ रहा था कि वो करें तो करें क्या? घर के हालात बिगड़ते गए। कर्ज भी घर में पैर पसार चुका था। छोटी सी भानु रेखा और उनकी बहन इस मुश्किल दौर में समाज और आसपोस के साथ-साथ स्कूल में नाजायज संतान होने के दर्द और कड़वे तानों को सुन और सहन कर रही थी। स्कूल में बच्चे भानु रेखा को नाजायज शब्द से बुलाकर रोज दर्द देते जिसकी वजह से भानु रेखा का स्कूल जाना भी मुश्किल हो गया था। ऐसे में मासूम सी रेखा का

मन पढ़ाई में लगे तो लगे कैसे? वह हर रोज बेइज्जती का दर्द झेल रही थी और इसी दर्द को झेलते हुए भानु रेखा फेल हो गई। भानु रेखा जहां कड़वे तानों से परेशान हो गई थी तो वहीं वो अपने लिए काली, मोटी और भद्दी जैसे शब्दों को अपने लिए सुनना बड़ा ही मुश्किल हो गया था। यह शब्द भानु रेखा की जिंदगी में जहर का काम कर रहे थे। और इन्हीं सब बातों से परेशान होकर एक दिन मासूम सी भानु रेखा ने अपनी मां को चिट्ठी लिखते हुए नाबालिक उम्र में ही अपनी जिंदगी को हमेशा हमेशा के लिए खत्म करने का फैसला कर लिया और भानु रेखा ने उस वक्त ढेरों नींद की गोलियां खा ली लेकिन शायद किस्मत को अभी यह मंजूर नहीं था। डॉक्टर की मदद से भानु रेखा को बचा लिया गया और जब भानु रेखा होश में आई तो उनको सबसे पहले अपनी मां का रोता हुआ चेहरा दिखा। मां को रोते देख भानु रेखा मां से लिपट लिपट कर जोर-जोर से रोने लगी। बेटी की ऐसी हालत देख पुष्पावली भी अपने आप को रोक ना पाई और खुद भी टूट गई। दुख भरे इन हालातों में मां ने रेखा को समझाया और संभाला। उन्होंने रेखा से फिल्मों में आगे काम करने के लिए

कहा क्योंकि पुष्पावली को रेखा से ही उम्मीदें थी कि भानु रेखा पूरे परिवार का सहारा बन सकती हैं। लिहाजा भानु रेखा की पढ़ाई छूट गई और अब पुष्पावली भानु रेखा को जगह-जगह स्टूडियो में ऑडिशन दिलवाने ले जाने लगी। भानु रेखा भूखी प्यासी धूप छांव में खड़े होकर ऑडिशंस देती तो कभी इंतजार करती और इतना सब होने पर भी भानु रेखा को फिल्म निर्माताओं की बेरुखी का सामना करना पड़ता था। सुख के दिन चले गए तो क्या दुख के दिन आ जाएंगे? सब जानते थे कि भानु रेखा जैमिनी गणेशन की नाजायज बेटी है और ऐसे में जब जैमिनी गणेशन को ही अपनी बेटी की फिक्र या रिश्ता उन्होंने नहीं माना तो ऐसे में फिल्म निर्माता भी भानु रेखा को यह सोचकर काम नहीं देते थे कि कहीं भानु रेखा को हमने काम दे दिया तो कहीं जैमिनी गणेशन हमसे नाराज ना हो जाए क्योंकि जैमिनी गणेशन उन दिनों एक प्रभावशाली और बड़ा नाम और सुपरस्टार थे और इस सब के चलते भानु रेखा को छोटे-छोटे रोल करने के लिए मिलने लगे। लेकिन उनको कोई भी अपनी फिल्म की हीरोइन बनाने को तैयार नहीं था क्योंकि सबकी नजर में रेखा का रंग रूप काफी भद्दा था। वो मोटी काली दिखने वाली लड़की थीं।

इधर भानु रेखा का भी मनोबल टूटने लगा तो उधर उनकी मां पुष्पावली को यही लगने लगा कि भानु रेखा उनके सपनों को साकार नहीं कर पाएंगी। इन सब तकलीफों के बीच साल 1969 को भानु रेखा की एक फिल्म ऑपरेशन जैकपॉट नली सीआईडी 999 रिलीज हुई। हैंड्स अप। आई थैंक यू वेरी वेरीरी मच। हालांकि इन फिल्मों में काम करने से भानु रेखा को कोई कामयाबी तो नहीं मिल रही थी लेकिन घर चलाने के लिए राहत मिल रही थी। इसके बाद भानु रेखा ने जिंदगी में उम्मीद की किरण बनकर आए फिल्म निर्माता कुलजीत सिंह पाल जिनकी फिल्म अनजाना सफर में भानु रेखा पहली बार बतौर एक हीरोइन के तौर पर नजर आने वाली थी। लेकिन यह एक हिंदी फिल्म थी और भानु रेखा तो हिंदी भाषा का एक शब्द तक नहीं जानती थी। लेकिन अपनी कड़ी मेहनत के साथ भानु रेखा ने हिंदी का अभ्यास किया और फिल्म के लिए अपना कदम आगे बढ़ा दिया। कुलजीत रेखा की फिल्मों के प्रति लगन को देखकर काफी प्रभावित हुए और उन्होंने उसी दिन भानु रेखा से 5 साल के कॉन्ट्रैक्ट पर हस्ताक्षर करा लिए और रेखा को इस तरह अपनी पहली हिंदी फिल्म मिल गई और साथ ही इस फिल्म के लिए मिले ₹25,000

और रेखा को इस तरह अपनी पहली हिंदी फिल्म मिली और साथ ही इस फिल्म के लिए मिले ₹25,000। भानु रेखा की आने वाली फिल्मों में हर बार ₹25,000 और जुड़ते चले गए। बेटी के इस कदम और सफलता से मां पुष्पावली बेहद खुश थी क्योंकि जो पैसे रेखा को मिलने वाले थे उससे उनके जीवन की सारी परेशानी खत्म हो रही थी। हर मुसीबत का मुकाबला हंसते-हंसते करना चाहिए। इसके बाद 1979 में 15 साल की छोटी सी भानु रेखा के कदम पहली बार पड़े माया नगरी बंबई में यानी आज के मुंबई में। यहां भानु रेखा को अजंता प्लेस में रहने के लिए एक कमरा मिला। यह वो कमरा था जहां शूटिंग के बाद भानु रेखा रहती थी। ये रहा आपका कमरा। कमरा छोटा तो जरूर है मगर मुझे उम्मीद है आपको यहां किसी किस्म की कोई तकलीफ नहीं होगी। भानु रेखा मुंबई आ तो गई थी परिवार की खातिर लेकिन वो यहां खुश नहीं थी क्योंकि उनके दिल में घबराहट थी नया शहर अनजानी भाषा ना पसंद का खाना कुछ भी उनके मन का नहीं था लेकिन भानु रेखा मन को मारते हुए दिन रात काम करती एक स्टूडियो से दूसरे स्टूडियो भागती वो बस अब एक कठपुतली की तरह काम कर रही थी क्योंकि उनके ऊपर परिवार

की जिम्मेदारी थी कुछ समय बाद रेखा की पहली फिल्म अनजाना सफर का मुहूर्त हुआ। लेकिन किसी वजह से इस फिल्म का नाम बदलकर दो शिकारी रख दिया गया। चांद क्यों दर्द है रात पे? मुहूर्त पर लोग भानु रेखा को हीरोइन के तौर पर देखकर हैरान थे। आलोचकों ने फिल्म निर्माता कुलजीत को कहा कि तुमको फिल्म के लिए यही नाजायज और काली मोटी लड़की ही पसंद आई। लेकिन शायद उस वक्त यह बात किसी को भी नहीं पता थी कि आने वाले समय में यह लड़की कितना बड़ा इतिहास रचने वाली थी। इसके बाद भानु को कुछ और हिंदी फिल्म मेहमान हसीनों का देवता सावन भादो मिल गई। इसके बाद भानु रेखा की पहली फिल्म की शूटिंग शुरू हुई। लेकिन इस

फिल्म के सेट पर भानु रेखा के साथ जो हुआ वह शायद नहीं होना चाहिए । इस फिल्म के हीरो विश्वजीत फिल्म के एक सीन में भानु रेखा को अचानक से किस करने लगते हैं। बताया जाता है कि इस तरह के किसी भी सीन के बारे में भानु रेखा को कुछ भी नहीं बताया गया था। इस सीन के दौरान ही भानु रेखा की आंखों से आंसुओं की धारा निकल गई। वह अपने आप को ठगा हुआ महसूस करने लगी। उनके मन में बहुत सारे सवाल खड़े हो रहे थे। वो फिल्म के हीरो और फिल्म निर्माता के खिलाफ जाना चाहती थी। लेकिन वो ऐसा नहीं कर पाए क्योंकि उनको पता था कि अगर उन्होंने ऐसा किया तो उनको फिल्मों से बाहर कर दिया जाएगा और उनकी मां के सपने पल भर में मिट्टी में मिल जाएंगे। मुझे कब जाना होगा? दैट्स अ ग्रेव गर्ल। इस हादसे के बाद भानु रेखा ने अपने आप को मजबूत किया और अब उन्होंने अपने तरीके से जिंदगी को जीने का फैसला किया। जिसकी शुरुआत भानु रेखा ने अपने नाजायज पिता जैेमिनी गणेशन का नाम अपने नाम से हटाकर सिर्फ रेखा रखकर किया। तो तुम भी सुन लो कि आज मैं बहुत खुश हूं। रेखा अपनी मजबूत सोच के साथ आगे बढ़ रही थी। लेकिन उनके मां-बाप के अतीत ने उनका कभी भी कहीं भी पीछा नहीं छोड़ा। रेखा की जब पहली फिल्म दो शिकारी रिलीज होने से पहले सेंसर बोर्ड के पास पहुंची तो यह फिल्म पास नहीं हो पाई क्योंकि उस वक्त रेखा नाबालिक थी और फिल्म में कुछ सीन आपत्तिजनक थे। लिहाजा इस फिल्म को रोक दिया गया और इसके बाद यह

फिल्म लगभग 10 साल बाद 1979 में रिलीज हुई थी। एक्सक्यूज मी। क्या मैं मिस्टर रंजीत से मिल सकती हूं? कहिए क्या बात है? ओ तो आप मिस्टर रंजीत है? जी नहीं मेरा नाम सतीश है। मैं इस लॉज में काम करता हूं। लेकिन इसी बीच रेखा कई और फिल्मों की शूटिंग शुरू कर चुकी थी और उन्हीं में से एक फिल्म थी सावर भादो। कान में झुमका जाल में ठुमका कमर पे चोटी लटके हो गया दिल का पुरजा। इस फिल्म में रेखा के साथ थे उस दौर के बेहद खूबसूरत हीरो नवीन निश्चल। नवीन निश्चल उन दिनों एक बड़ा नाम थे। नवीन निश्चल ने जब पहली बार रेखा को देखा तो वह फिल्म के निर्माता मोहन बाबू से काफी नाराज हुए थे। वो रेखा के रंगरूप को काफी अपमानजनक दृष्टि से देख रहे थे। वो रेखा की वजह से फिल्म छोड़ने को राजी हो गए। लेकिन उनको काफी समझा-बुझाकर मना लिया गया। रेखा हर कदम पर दुनिया की जिल्लत का सामना कर रही थी। इस फिल्म में गोरे रंगरूप के नवीन निश्चल के आगे रेखा को चेहरे से लेकर पैर तक मेकअप करके थोड़ा बहुत गोरा बनाया जाता था। यह सब होते देखकर फिल्म यूनिट के लोग रेखा का मजाक बनाते लेकिन रेखा चुपचाप अपना काम करती रहती। वो अक्सर काम खत्म करके अपने घर आकर रोती रहती और इन सवालों के जवाब ढूंढने में लग

जाती। सावन भादो फिल्म की शूटिंग पूरी हुई और इस फिल्म का प्रीमियर रखा गया। यहां आए सभी लोगों ने नवीन निश्चल की तारीफ कर दी। लेकिन बेचारी रेखा को यहां भी आलोचनाओं और तिलस्कार का सामना करना पड़ा और यहीं पर मशहूर फिल्म अभिनेता शशि कपूर भी आए थे। जिन्होंने रेखा को पहली बार देखा था और उनके मुंह से निकला कि ये काली मोटी फूहड़ लड़की कैसे इंडस्ट्री में टिक पाएगी। रेखा ने जब यह बात सुनी तो वह कुछ नहीं बोली। लेकिन शशि कपूर की पत्नी ने रेखा की आंखें पढ़ ली और शशि से कहा कि शशि जी आप देखना यह लड़की आने वाले समय में कई साल तक सिनेमा पर राज करेगी और यह बात किसको मालूम थी कि यही लड़की हिंदुस्तान में एक खूबसूरती स्टाइल की एक नई इबादत लिख देगी। झूठ बोलोगे तो मेरा मन मुझे बता देगा। फिल्म सावन भादुर रिलीज हुई और यह फिल्म उस समय की एक बड़ी हिट फिल्म बनी। इस फिल्म ने कामयाबी के साथ सिल्वर जुबली बनाई और रेखा इसी फिल्म के साथ रातोंरात एक स्टार बन गई। मेरा मन घबराए तेरी आंखों में नी इस फिल्म की कामयाबी के बाद तो रेखा के आगे एक के बाद एक फिल्मों की लाइन लगती चली गई। और

एक समय ऐसा हो गया था कि रेखा तकरीबन 25 फिल्मों में एक साथ काम कर रही थी। वह हर रोज दो शिफ्टों में काम करने लगी। रेखा अपनी कामयाबी की तरफ दौड़ रही थी। रेखा की अब हर साल दर्जन भर फिल्में रिलीज होती और रेखा ऊंचाई के सातवें आसमान पर थी। साल 1972 में रेखा ने एक फिल्म एक बेचारा की थी जिसमें इनके हीरो जितेंद्र थे। जितेंद्र उन दिनों लड़कियों के पसंदीदा एक्टर हुआ करते थे। जितेंद्र के साथ काम करते-करते कब जितेंद्र रेखा की पसंद बन गए, पता ही नहीं चला। जितेंद्र रेखा को बड़े सम्मान के साथ इज्जत दिया करते थे और यह सब चीज रेखा के दिल में घर कर गई। रेखा जितेंद्र में अपना भविष्य देखने लगी। तेरी मेरी शादी सीधी साधी पंडित मां शहनाई रे सब लेकिन शायद रेखा के नसीब में खुशी थी ही नहीं क्योंकि जिस जितेंद्र को रेखा अपना बनाने की सोच रही थी वो जितेंद्र पहले से अपनी एक महिला मित्र शोभा जो आगे चलकर इनकी धर्मपत्नी बनी उनको प्यार करते थे। जितेंद्र शोभा को नहीं छोड़ सकते थे। लिहाजा अब जितेंद्र और रेखा में झगड़े होने लगे। यह तुम भी अच्छी तरह समझ लो। तो फिर आज से हम दोनों के रास्ते अलग-अलग। बिल्कुल अलग-अलग। इसके बाद इन दोनों के बीच हालात यह हो गए कि यह फिल्म तो एक साथ कर रहे थे, लेकिन बातचीत पूरी तरह से बंद हो गई थी। रेखा जो पहले से ही जिंदगी

में बहुत कुछ झेल चुकी थी, वह पहली बार दिल के टूटने के दर्द को भी झेल रही थी। पहली बार रेखा का दिल टूटा था। दर्द से गुजर रही रेखा को अभी यह एहसास भी नहीं था कि किस्मत उनको अभी ऐसे ही ना जाने कितने मोड़ों पर लाकर खड़ा कर देगी। तो मैं सच कहती हूं मैं जिंदा नहीं रहूंगी राम मैं मर जाऊंगी। रेखा की निजी जिंदगी में दर्द था लेकिन फिल्मी सफर का काम वैसा ही चल रहा था। रेखा की झोली में फिल्में गिर रही थी और रेखा उस दौर के सभी बड़े स्टार और सुपरस्टार्स जैसे राजेंद्र कुमार, सुनील दत्त, विनोद खन्ना, धर्मेंद्र और राजेश खन्ना की हीरोइन बनकर फिल्मी पर्दे पर नजर आ रही थी। नदिया से दरिया दरिया से सागर रेखा के पास अभी सब कुछ था। अपना खुद का नाम था, शोहरत थी। लेकिन अगर नहीं था तो वो था एक हमसफर और

एक प्यार करने वाला। बहुत जल्दी ही रेखा की जिंदगी में एक ऐसा इंसान आया जिसने रेखा को समझाया और प्यार दिया और उनके टूटे दिल को जोड़ने में कामयाबी उन्हें मिली। और उनका नाम था विनोद मेहरा जो कि हिंदी सिनेमा के एक जानेमाने फिल्म एक्टर थे। आपकी आंखों में कुछ महके हुए से रेखा और विनोद मेहरा ने पहली बार एक फिल्म ऐलान में साथ काम किया था जो साल 1971 में रिलीज हुई थी। रेखा और विनोद मेहरा में जल्दी ही दोस्ती हो गई और यह दोस्ती प्यार में बदल गई। रेखा का यह वो वक्त था जब यह दिल से खुश थी विनोद मेहरा के साथ। विनोद मेहरा वो इंसान थे जो

रेखा की प्यार में ईमानदारी और उनके खुले विचारों को पसंद करते थे। विनोद मेहरा रेखा से शादी करना चाहते थे और रेखा भी इस रिश्ते से बेहद खुश थी। प्यार का यह रिश्ता इन दोनों को एक दूसरे का अपना तो बना रहा था लेकिन इस रिश्ते में एक ऐसा इंसान भी था जो इन सब से खुश नहीं था और वो थी विनोद मेहरा की मां कमला मेहरा। कमला मेहरा अपने बेटे के लिए एक संस्कारी और घरेलू बहू लाना चाहती थी।