क्या दलित समुदाय के लोगों के हाथ का बना खाना खाने से देवताओं के प्रकोप का सामना करना पड़ता है? 21 साल की शर्मिष्ठा ने इन दानूसी बातों को कई बार सुना है, भोगा है। वह इसलिए क्योंकि यह दलित समुदाय से आती हैं और गांव के एक आंगनबाड़ी सेंटर में कुक की नौकरी करती हैं। शर्मिष्ठा ओसा के केंद्रपाड़ा जिले के नौगांव की रहने वाली हैं। अपने गांव में सरकारी नौकरी पाने वाली कुछ गिनी चुनी लड़कियों में से एक हैं। लेकिन अब वह पूरे गांव के बहिष्कार का सामना कर रही हैं। गांव के ही आंगनबाड़ी सेंटर पर हेल्पर कम कुक के तौर पर नियुक्ति हुई। लेकिन यहां तक पहुंचना शर्मिष्ठा के लिए इतना मुश्किल नहीं था जितना आगे होने वाला था। रोज सुबह 7:00 बजे वह नौगांव के दलित बस्ती वाले इलाके से साइकिल चलाकर स्कूल पहुंचती हैं। फर्श पर झाड़ू लगाती है। बच्चों के लिए चटाई बिछाती है और बस इंतजार करती है। इंतजार इसलिए क्योंकि पिछले साल 2025 में नवंबर
महीने की 21 तारीख से बच्चों ने स्कूल आना बंद कर रखा है। क्यों? क्योंकि 5 ट्रिलियन इकॉनमी की ट्रैक पर चलने वाले भारत के एक छोटे से गांव में रहने वाले परिवारों को शर्मिष्ठा के हाथ का खाना नागवार था। वजह वो दलित समुदाय से आती है। 4 महीने से चल रहे इस सामाजिक बहिष्कार का मामला देश की संसद जा पहुंचा। 12 फरवरी को कांग्रेस अध्यक्ष मलिकार्जुन खरगे ने इस मामले पर सवाल उठाए। उनका यह स्टेटमेंट सुनिए। फिर आगे की बात विस्तार से करते हैं। 21वीं सदी में जबकि हम बड़े-बड़े सामाजिक विकास के दावे करते हैं। सामाजिक रिफॉर्म की बात करते हैं। हिंदू एक होना इसकी बात
करते हैं। तो ओसा में एक दलित महिला हेल्पर कम कुक द्वारा तैयार भोजन को समुदाय विशेष के लोग अपने बच्चों को देने से मना कर देते हैं। पिछले तीन महीनों से उस आंगनवाड़ी सेंटर का बॉयकॉट चल रहा है। सभापति जी आंगनवाड़ी सेंटर्स बच्चों के फिजिकल और कॉग्निटिव विकास की बुनियाद है। लेकिन अगर इस तरह के जातिगत पूर्वाग्रह और भेदभाव है तो स्वाभाविक तौर पर इसका असर बच्चों के ग्रोथ पर भी पड़ेगा। इस प्रकार की घटनाएं संविधान के आर्टिकल 21 ए के तहत शिक्षा के अधिकार को सीधे प्रभावित करती है। आर्टिकल 47 में नीति उस दायित्व के विपरीत है जिसके अनुसार राज्य पर पोषण स्तर बढ़ाने और जन स्वास्थ्य सुधारने की जिम्मेदारी है। मैं आपसे अनुरोध करूंगा कि ऐसे मुद्दे को वर्क प्लेसेस पर होने वाले व्यापक
जाति आधारित भेदभाव के संदर्भ में भी देखा जाएगा। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक शर्मिष्ठा सेठी बताती हैं कि पिछले साल नवंबर महीने का दूसरा सप्ताह था। गांव में कुछ अधिकारी आए। उन्होंने बिजली के पोल पर लेटर चसपा किया। उसमें मेरा नाम आया था। नौकरी पक्की हो गई। तभी गांव में अगड़ी जाति के 50 से 60 लोग आए। उन्होंने मुझे और मेरे पिता को बुलाकर सवाल किया कि नौकरी का आवेदन क्यों किया जब शेड्यूल कास्ट से आती हो? शर्मिष्ठा ने बताया कि गांव वालों का कहना है कि अगर उनके बच्चों ने मेरे हाथ का बना खाना खाया तो उन्हें देवताओं के प्रकोप का सामना करना पड़ेगा। मैंने उन्हें समझाने की बहुत कोशिश की। यहां तक कि उनके सामने फूट-फूट कर रोए भी लेकिन किसी ने एक ना सुनी। जब से 20 नवंबर
को उसने हेल्पर और रसोइए के तौर पर शर्मिष्ठा ने काम शुरू किया तब से आंगनबाड़ी सेंटर में बच्चों का आना बंद हो गया है। इतना ही नहीं सेंटर पर 3 साल से कम उम्र के बच्चों के माता-पिता को राशन मिलता है। वो भी नहीं आ रहे हैं। शर्मिष्ठा ने कहा, मैंने यह भी समझाया कि खाना नहीं तो कम से कम राशन ही ले जाइए। लेकिन वह इसके लिए भी नहीं माने। स्टूडेंट लोग नहीं आ रहे हैं क्योंकि मैं कास्ट हूं। तीन महीना एजुकेशन सेंटर में ऐसा होना चाहिए। नहीं एजुकेशन सेंटर में ऐसा नहीं हुआ है। नहीं होना चाहिए। स्टूडेंट ने खाने के लिए मना कर दिया है क्योंकि मैं शेड्यूल कास्ट हूं। इसलिए सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार इस सेंटर पर 42 बच्चे आते हैं। इनमें से 20 बच्चे तीन से छ साल के बीच के हैं। यहां वो पढ़ते भी हैं और उन्हें मील भी दिया जाता है। 22 बुधेहे बच्चे हैं जिनके घर राशन जाता है। फिलहाल इस पूरी संख्या में से केवल दो बच्चे आ रहे हैं। वह भी दलित समुदाय से आते हैं। और तो और गांव में रहने वाली एक और महिला लिज़ा पांडव पर भी दबाव बनाया गया। यह
आंगनबाड़ी कार्यकर्ता हैं। सेंटर के लिए कोई स्थाई जगह नहीं है। इसलिए इन्हीं के घर संचालन चल रहा था। लेकिन दबाव में आकर उन्होंने भी अपने घर में सेंटर चलाने से मना कर दिया। 6 फरवरी से आंगनबाड़ी अब गांव में प्राइमरी स्कूल की एक पुरानी बिल्डिंग में चल रहा है। अब जिस पद के लिए शर्मिष्ठा ने अप्लाई किया है, उसकी भी बात कर लेते हैं। वह लंबे समय से खाली पड़ा था। इसे भरने के लिए 2024 में एक नोटिस निकाला गया था। लेकिन तब किसी ने आवेदन नहीं किया। इसके बाद नवंबर 2025 में फिर से नया नोटिस जारी किया गया। इस बार शर्मिष्ठा सेठी अकेली उम्मीदवार थी जिन्होंने आवेदन किया और इसी महीने उनकी नियुक्ति भी हो गई।
आंगनबाड़ी में सहायिका के लिए 12वीं पास होना जरूरी है। हर महीने ₹5000 मामूली तनख्वाह मिलती है। हैरानी की बात यह है कि शर्मिष्ठा इस नौकरी के लिए ओवर क्वालिफाइड है। उसने बीए किया है। टीचर बनना चाहती है। अर्ली चाइल्डहुड केयर एजुकेशन में डिप्लोमा भी कर रही है। लेकिन उसने कुक के लिए अप्लाई किया ताकि वह अपने परिवार को फाइनेंशियली सपोर्ट कर सके। तो इस मामले में कारवाई क्या हुई है यह भी जान लेते हैं। केंद्रपाड़ा के सब कलेक्टर अरुण कुमार नायक का कहना है कि इस मामले को लेकर 14 फरवरी को एक बैठक हुई। गांव वालों की मांग है कि आंगनबाड़ी केंद्र के लिए एक स्थाई जगह बनाई जाए। लोगों को समझाने की कोशिश की गई। अधिकारियों ने शर्मिष्ठा के हाथ का खाना जो बनाया था शर्मिष्ठा ने उसे खाया। सामाजिक एकता और भाईचारे को बढ़ावा देने के लिए गांव में सांस्कृतिक कार्यक्रम किए गए। नाटकों के जरिए जाति आधारित
भेदभाव के खिलाफ संदेश दिया गया। शपथ ली गई कि आगे से ऐसा कुछ भी नहीं होगा। अधिकारी ने यह भी साफ कर दिया कि अगर गांव वालों का रवैया नहीं बदला तो उनके खिलाफ कानूनी कारवाई की जाएगी। फिलहाल गांव वाले बच्चों को आंगनबाड़ी सेंटर भेजने के लिए तैयार हो गए हैं। 16 फरवरी से क्लास दोबारा शुरू हो जाएगी। शर्मिष्ठा कोई अकेली नहीं है। देश भर में आज भी ऐसी घटनाएं सामने आती हैं। कानून सजा दे सकता है। प्रशासन नियम लागू कर सकता है। लेकिन समाज की सोच बदलना किसी सरकारी आदेश के बस की बात नहीं है। शमिष्ठा कहती हैं कि वह मामले को कानूनी तौर पर और नहीं खींचना चाहती क्योंकि आखिर में यह उनके अपने गांव का मामला है।