ब्रॉट टू यू बाय सेंस डीएसपी नया सेंसडेंट डीएसपी नर्स को प्रोटेक्ट करें और इनामल को रिपेयर फील द रिलीफ विद सेंसडेंट एसपी ₹66 की वजह से प्रोटेस्ट आजकल ₹66 की कीमत क्या हो सकती है? शायद एक से 2 किलो चावल, किसी बच्चे की अच्छी चॉकलेट या एक जगह से दूसरी जगह का किराया। लेकिन इस वीडियो में जो प्रोटेस्ट कर रही औरतें हैं यह ₹66 के लिए प्रोटेस्ट कर रही हैं। यह वीडियो छत्तीसगढ़ का है और इस वीडियो में जो महिलाएं प्रोटेस्ट कर रही हैं, यह मिड डे मील वर्कर है यानी कि रसोइया और इनकी मांग है कि इनका जो मानदेय है वह ₹66 से बढ़ाकर ₹350 से ₹400 के करीब किया जाए। इस वीडियो के बाद बहुत सारे सवाल हमारे मन में आते हैं कि आखिर यह ऐसी मांग क्यों कर रही हैं? दूसरा कि इनका सरकार से क्या-क्या डिमांड है? तीसरा कि इसके अलावा भी यह कुछ और चाहती हैं
और ओवरऑल इस पूरे प्रोटेस्ट का क्या सिनेरियो है और कब से ये महिलाएं प्रोटेस्ट कर रही हैं? इन सारे सवालों का जवाब आज के हम वीडियो में देने वाले हैं। तो सबसे पहला जो सवाल है कि आखिर ये महिलाएं प्रोटेस्ट क्यों कर रही हैं? तो छत्तीसगढ़ का यह वीडियो है। छत्तीसगढ़ के रायपुर के टूटा साइट का यह वीडियो है। जहां पर 50 दिन से भी ऊपर महिलाएं इस बात के लिए प्रोटेस्ट कर रही हैं कि उनका जो मानदेय है वह ₹66 से बढ़कर ₹350 से ₹400 किया जाए। यहां पर हम मानदेय का मतलब समझ लेते हैं। मानदेय को अंग्रेजी में ऑनरेरियम कहते हैं। जिसका मतलब यह होता है कि किसी भी आपके कंट्रीब्यूशन की वजह से जैसे कोई भी आपने स्वैक्षिक तौर पर काम किया। अपनी मर्जी से कोई भी योगदान दिया उसके बदले में जो भी आपको मौद्रिक भुगतान मिलता है मतलब जो भी आपको फाइनेंशियल पैसा मिलता है उसको हम मानदेय कहते हैं सिंपल लैंग्वेज में। तो इनका पर डे जो मानदेय है वो ₹66 है और यह कह रही हैं कि ये बहुत ही कम है इसलिए इनको बढ़ा देना चाहिए जो कि महीने का लगभग ₹2000 होता है। यह इनका डिमांड है।
दूसरा यह है कि यह महिलाएं इनकी संख्या कितनी है? तो हम इन सारे मुद्दों पर बात करेंगे। तो सबसे पहले हम देश भर में कितने मिड डे विल वर्कर्स हैं उन पर हम बात कर लेते हैं। तो यह गवर्नमेंट डाटा है जो कि राज्यसभा के क्वेश्चन आंसर के दौरान पब्लिक डोमेन में आया जिसमें हम यह देखते हैं कि ओवरऑल इंडिया में 25 लाख से भी ज्यादा मिड डे मील वर्कर्स हैं। और केवल छत्तीसगढ़ की बात करें तो छत्तीसगढ़ में 93,000 से ज्यादा मिड डे मील वर्कर्स हैं। और उसमें मुख्य रूप से महिलाएं हैं। यानी कि 76,000 से भी अधिक महिलाएं मिड डे मील वर्कर के तौर पर काम करती हैं। और वहीं हम पुरुषों की संख्या दे देखते हैं तो 16,000 के करीब पुरुष यहां पर मिड डे मील वर्कर के तौर पर काम करते हैं। तो यह प्रोटेस्ट हो रहा है। इनका यह मानना है कि बहुत सारे ऐसे स्टेट्स हैं जो ₹2000 से अधिक मानदेय देते हैं। जैसे केरल है वहां पर ₹12,000 प्रति माह महिलाओं को और जो भी वहां पे कुक हैं मिड डे मील वर्कर्स हैं उनको मिलता है। बहुत सारे स्टेट्स में ₹2000 से भी कम है। जैसे बिहार में 1600 के आसपास है। तो यह ऐसा यूनिफार्म नियम नहीं है और ऐसा यूनिफॉर्मिटी क्यों नहीं है? इस पर भी हम बात करेंगे। तो सबसे पहले हम उस पर बात करेंगे कि इस पूरे मामले में सरकार का क्या निर्देश है कि इनको कितने पैसे मिलने चाहिए? तो हम यह देखते हैं कि पहले जो इनके मानदेय का रूल था वह था प्रति बच्चा 0.40 और यह इतना कम था कि इतने कम पैसे में कोई भी रसोइया खाना बनाने के लिए तैयार नहीं था। जो जिसको
देखते हुए 1 दिसंबर 2009 को यह डिसीजन लिया गया कि जो रसोइयों का प्रति माह मानदेय जो होगा एटलीस्ट ₹1000 होना चाहिए और उसके साथ हम देखते हैं कि ₹1000 बहुत सारे स्टेट्स में मिलता है और कई जगह स्टेट में ₹1000 से ज्यादा भी मिलता है। वह इसलिए मिलता है क्योंकि यह सेंट्रल स्पोंसर्ड स्कीम है। इसका इसका मतलब यह है कि इसमें केंद्र सरकार का भी कंट्रीब्यूशन है और राज्य सरकार का भी कंट्रीब्यूशन है। तो कई जगह जो राज्य सरकारें हैं वह अपने रसोइयों को खुद से ज्यादा पैसा देते हैं। इस वजह से उनका मानदेय ज्यादा है। दूसरा इसके रखने के नियम क्या है? तो इसके रखने के जो नियम है कि यदि किसी स्कूल में 25 छात्रों का स्ट्रेंथ है तो वहां पर एक रसोइया मतलब एक कुक कम हेल्पर रहेगा। दूसरा अगर 26 से 100 छात्र हैं मतलब उनका स्ट्रेंथ 26 से लेके 100 तक है तो दो रसोइए वहां पे होंगे और अगर 100 से अतिरिक्त है तो एक और रसोइया और एक हेल्पर होगा। तो ये इनका नियम है जो कि पीएम पोषण साइट से हमें मिला है। और मिड डे मील की शुरुआत कब हुई? तो इसकी शुरुआत 1995 में हुई और ये उस
समय भी सेंट्रली स्पों्सर्ड स्कीम था। जो जिस स्कीम का नाम था नेशनल प्रोग्राम ऑफ न्यूट्रिशनल सपोर्ट टू प्राइमरी एजुकेशन एनपीएसपी और इसका क्या मुख्य उद्देश्य था? इसका मुख्य उद्देश्य यह था कि बच्चों को पोषण आहार दिया जाए और बहुत सारे बच्चे स्कूल इसलिए मिस करते थे क्योंकि उनके पास एक पौष्टिक आहार की सुविधा नहीं थी। तो जो एडमिशन रेट बढ़ाने के लिए क्या-क्या किया जा सकता है? तो उसमें एक डिसीजन यह भी लिया गया कि बच्चों को पौष्टिक आहार स्कूल में ही प्रोवाइड कराया जाए। इस वजह से मिड डे मील की व्यवस्था की गई और उनके उपस्थिति भी उसके बाद सुधरी। अब हम यह देखते हैं कि यह शुरुआत कहां से हुई? तो इसका स्टार्टिंग जो हुआ 2408 ब्लॉक में हुआ इंडिया के। बाद में इसका शुरुआत ऑल ओवर इंडिया में हुआ और स्टार्टिंग में यह एक से पांच तक के बच्चों के लिए था। लेकिन 2001 में सुप्रीम कोर्ट का एक नियम आया। उन्होंने बोला कि जो बच्चों को पका हुआ भोजन दिया जाए। मतलब कच्चा चावल दाल ना देकर उनको पका हुआ भोजन दिया जाए और 2008 और नौ में यह केवल एक से पांच तक सीमित नहीं रहा। मतलब एक से आठ तक के बच्चों को मिड डे
मील की व्यवस्था की जाए। उसके बाद हम देखते हैं कि बहुत सारे स्कूलों में पका हुआ भोजन मिलता है और वर्तमान में यह पीएम पोषण स्कीम के अंतर्गत काम करता है जिसका फुल फॉर्म है प्रधानमंत्री पोषण शक्ति निर्माण और इस योजना का मुख्य उद्देश्य यह है कि सुपोषित भारत बनाया जाए। मतलब कि माल न्यूट्रिशन की जो भी समस्याएं आ रही हैं, लैक्टेटिंग मदर में जो भी प्रॉब्लम्स आ रहे हैं, पीएम पोषण का काम है कि स्कूल गोइंग चिल्ड्रन को उनको अच्छा और पौष्टिक आहार दिया जाए और उनके स्कूल में उपस्थिति को सुधारा जाए ताकि कोई भी बच्चा मील की वजह से स्कूल स्किप कर रहा है। यह प्रॉब्लम नहीं आनी चाहिए। तो यह रहा पीएम पोषण का उद्देश्य। अब इस मामले में हम जुड़ आते हैं कि आखिर लोग प्रोटेस्ट क्यों कर रहे हैं? तो हमने प्रोटेस्ट का बेसिक जानकारी दे दिया है कि उनको 2000 से बढ़ाकर 12,000 करना है। लेकिन इस मामले में हम खुद प्रोटेस्टर से सुन लेते हैं कि उनका क्या कहना है। इसके लिए हमारी आज तक की पत्रकार सुमर अजपन प्रोटेस्ट साइट पर पहुंची थी। सुनिए उन्होंने प्रोटेस्टर से क्या बातचीत की। मैडम हम लोग 22वां दिन है। हम लोग का लगातार चल रहा है हड़ताल। राशन पानी जो भी लेके आए थे वो तो खत्म हो गया। सरकार की तरफ से तो हम लोग को कुछ सुध ही नहीं ले रही है। सरकार ना कोई उनके
तरफ से कोई नेतृत्व करने आ रहे हैं। तो अब ऐसे स्थिति में हम लोग कहां जाएंगे? भीख मांगने ही पे सरकार हम लोग को मजबूरी कर रही है। किस तरह से आप लोग का जीवन यापन होता है? ₹6 कितने सालों से मिल रहे हैं? ₹6 कब से मिल रहे हैं आप लोगों को? हम लोग को तो 31 साल हो गया है मैडम। यहां काम करते हुए शिक्षा विभाग में छ पहले तो ₹15 से चालू हुआ है। ₹15 से लेके अब तक का हम लोग का मानदेय में ₹6 का बढ़ोतरी हुआ है। जब आप लोग यहां आए तो सरकारी स्कूलों में बच्चों की थालियों पे जो खाना जा रहा है वो कौन बना रहा है? वहां वहां जो अभी बच्चे टिफिन लेकर आ रहे हैं। वहां खाना जो मध्यान भोजन है वह पूरी तरह ढप है। उसमें कोई जगह खाना नहीं बना रहे हैं। कहीं-कहीं मास्टर अपने बचाव के लिए वहां रिपोर्ट भेज रहे हैं कि यहां मध्यान भोजन संचालित हो रहे हैं बोल के। लेकिन पूरे प्रदेश में कोई भी स्कूल में मध्यान भोजन संचालित नहीं हो रहा है। इस मामले में हमने छत्तीसगढ़ रसोईया समूह के अध्यक्ष रामराज कश्यप से भी बात की। सुनिए उन्होंने क्या-क्या अपनी मांगे गिनाई और क्या-क्या समस्याएं प्रोटेस्ट साइट पर आ रही है। उन्होंने क्या कहा। धरना प्रदर्शन पर बैठे हैं। लेकिन 53 दिन होने के बावजूद भी आज तक सरकार ने किसी भी प्रकार का
हम लोगों के बारे में सुध नहीं लिया है। ना देखने के लिए आए हैं ना पूछने के लिए। हम लोगों ने आज 53 दिन तक यहां भूखे प्यासे बैठे हैं। मजबूर हैं। हम भूखे प्यासे रहने के लिए। फिर भी आज रसोइया का हिम्मत नहीं टूट चुका है और एक उम्मीद जगा हुआ है कि हम लोगों को कलेक्टर दर पर मानदेय दिया जाए बोल के हमारी जो प्रथम मांग है हमको कलेक्टर दर पर मानदेय दिया जाए। दूसरी मांग है कि हमको अंशकालीन से पूर्णकालीन किया जाए। तीसरी जो मांग है जिस भी स्कूल में छात्र-छात्राओं की दर्ज संख्या कम होने पर रसोइया को ना निकाला जाए। चौथी मांग है कि रसोइया के ऊपर में झूठा एफआईआर दर्ज लगाया गया है उसको तुरंत बहाल किया जाए। एक चार सूत्री मांग को लेकर आज तक हम लोगों ने 53 दिन तक बैठे हैं और इस दरमियान में हमारे आए दिन हमारे रसोइया साथियों ने बीमार पड़ते आ रहे हैं। अभी भी लगातार दो से चार दिन के पहले कम से कम 10 मरीज को वहां हॉस्पिटल में एडमिट कराए हैं। वो अभी तक वो लोग भी आराम नहीं हुए हैं।
आज हमारे पास में दयनीय स्थिति बहुत खराब हो चुकी है। खाने के लिए चावल नहीं है। पीने के लिए पानी के व्यर्थ नहीं है। अब इस पूरे मामले में एक और एंगल आ रहा है। यह एंगल है दो लोगों की जान का। प्रोटेस्टर्स का दावा है कि बहुत सारे संख्याओं में महिलाएं यहां पे प्रोटेस्ट कर रही हैं और यह दिसंबर एंड से प्रोटेस्ट चालू हुआ था। यानी कि 29 दिसंबर से ये प्रोटेस्ट चालू हुआ था और अभी तक यह प्रोटेस्ट चल रहा है। तो इसमें बहुत बीच में ठंड का मौसम आया था। बहुत सारी महिलाएं इसमें बीमार भी पड़ी और दो महिलाओं की मौत प्रोटेस्ट में हिस्सा लेने के वजह से हो गई। हमने उन दो परिवारों से बात करने की भी कोशिश की। उन दो महिलाओं का नाम है दुलारी यादव और दूसरी का नाम है रुक्मणी सिंह। हमने उनसे भी बात करने की कोशिश की। लेकिन हमारी उनसे बातचीत फोन पर ही हो पाई है। हमारी रुक्मणी सिंह के परिवार से बातचीत फोन पर हो पाई है। जिला बालू छत्तीसगढ़ से मेरी मां का नाम है रुकमणी बाई सना। मेरी मां रायपुर गया था 20 तारीख को हड़ताल में। 212 23 को हड़ताल में था। और 24 तारीख को
सुबह मेरी मां घर वापस आ गया। तबीयत ठीक नहीं लग रहा है करके। फिर हम लोग सोचा कि थकावट की वजह से होगा करके उसको टेबलेट खिलाया। वही नाइट 24 तारीख को मेरी मां बहुत ज्यादा सीरियस हो गया। फिर हम लोग सुबह 25 तारीख सुबह 25 तारीख को हम लोग 108 बुलाकर जिला बालोद अस्पताल में भर्ती किया। फिर वहां के डॉक्टर लोग बोला कि आपकी मां का बीपी पूरा लो हो गया है और शुगर बहुत ज्यादा बढ़ गया है करके देवेंद्र का कहना है कि उनकी मां ही उनके घर का पूरा खर्चा उठाती थी और वह अपने घर में पूरी तरह से मां पर आश्रित हैं। देवेंद्र एक विकलांग है और उनके घर में कोई और सोर्स ऑफ सोर्स ऑफ इनकम नहीं है। हमारी बात दुलारी देवी के परिवार से नहीं हो पाई है। तो यह रहा प्रोटेस्टर्स का कहना और यह उनके आरोप है कि प्रोटेस्ट साइट पर बहुत सारे लोग अभी भी जमे हुए हैं। रामराज कश्यप का कहना है कि करीब 15 से 20,000 अभी भी प्रोटेस्टर्स टूटा साइट पर प्रोटेस्ट कर रहे हैं और उनकी यह डिमांड है कि जब तक से उनका मानदेय नहीं बढ़ाया जाएगा तब तक से वह प्रोटेस्ट साइट को खाली
नहीं करेंगे और यह केवल मानदेय बढ़ाने की ही डिमांड नहीं है। उन्होंने यह भी बोला कि साथ ही साथ उन्हें अंशकालिक की जगह पर पूर्णकालिक किया जाए। यानी कि उनको कॉन्ट्रकुअल वर्कर के तौर पर काम नहीं करना है। उनको फुल टाइम वर्कर के तौर पर काम करना है। और बहुत सारे स्कूल्स में हम देखते हैं कि बच्चों की स्ट्रेंथ कम होने के कारण रसोइयों को हटा दिया जाता है। तो उन्होंने यह भी कहा कि बहुत सारे बच्चों को हट कम होने के कारण रसोइयों को हटा दिया जाता है और अचानक से उनकी जॉब चली जाती है। तो इस बारे में भी सरकार को ध्यान देना पड़ेगा। हमने यह बात भी करने की कोशिश की कि सरकार का इस पे पूरा क्या टेक है। तो रामराज कश्यप ने बताया कि सरकार की ओर से अभी तक कोई भी सुनवाई नहीं हो पाई है और उन तक अभी कोई भी मदद नहीं पहुंची है। साथ ही जो दो महिलाएं इस पूरे प्रोटेस्ट के वजह से जिनकी मौत हो गई ऐसा दावा किया जा रहा है उनको भी कोई भी भुगतान या कोई भी उनके लिए अनाउंसमेंट नहीं हुआ है। तो यह टोटल अभी तक का कंडीशन है। फिलहाल अभी भी उस प्रोटेस्ट साइट पर लोग बने हुए हैं और वह अपनी मांगों पर अड़े हुए हैं। आज की वीडियो में यहीं तक जानकारी इस बारे में जो भी अपडेट्स आएगा हम
आप तक बताते रहेंगे। मेरा नाम है रितू। देखते रहिए दलन टॉक। अगर 22 फरवरी को आप लखनऊ में ना यूपी में कहीं भी हैं तो घर पर बैठना बिल्कुल मना है। क्योंकि 22 फरवरी को आपके शहर में होने जा रहा है लल्लन टॉप यूपी अड्डा। जहां आएंगे आपके फेवरेट स्टार्स बिना लाग लपेट के होंगी बहुत सारी बातें बटेंगे ललन टॉप के गुलाबी तकिए और माहौल होगा फुल्ली चार्ज और अगर आपको इवेंट के बाद बढ़िया-बढ़िया रील्स देखते हुए या जाना चाहिए था वाला फोमो नहीं चाहिए तो 22 फरवरी को अपने सारे कामधामछोड़िए और तशरीफ लाइए जुपिटर हॉल इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान लखनऊ एंट्री सुबह 11:00 बजे से रजिस्ट्रेशन बिल्कुल फ्री फ्री फ्री एंट्री भी फ्री मगर वाइब प्रीमियम स्म की गारंटी हमारी बस जाइए दलन.com पर बैनर पर कीजिए क्लिक और अभी कीजिए रजिस्ट्रेशन। तो मुस्कुराते हुए मिलते हैं लखनऊ में।