एक दूसरे के खून के प्यासे क्यों हैं मुसलमान और यहूदी, अमेरिका असली विलेन, राज़ क्या ?

जमीन का एक टुकड़ा जिसका एरिया सिर्फ 35 एकड़ जो दुनिया की पूरी जमीन का दशमलव से भी कम है। लेकिन यह छोटा सा प्लॉट [संगीत] दुनिया के सबसे विवादित जगहों में से एक है। ऐसा इसलिए कि दुनिया के तीन बड़े धर्म इस प्लॉट पर दावा करते हैं। यह जमीन है जेरूसलम में और वहां मौजूद है एक टेंपल जिसे यहूदी पुकारते हैं हर हवाई अत। यह हिब्रू भाषा का शब्द है। जिसे अंग्रेजी में टेंपल माउंट कहा जाता है। और इसी जगह को मुस्लिम बुलाते हैं हरम अल शरीफ। और इसी जमीन के टुकड़े की वजह से मुस्लिम और यहूदी बन गए हैं एक दूसरे के कट्ट

र दुश्मन। लेकिन ऐसा क्यों? क्या है पूरी कहानी? आइए जानते हैं। यहूदियों की मान्यताएं। इसी जगह पर उनके ईश्वर ने वो मिट्टी सिजोई थी जिससे एडमम का सृजन हुआ। एडमम माने वो पहला शख्स जिससे इंसानों की भावी पीढ़ियां अस्तित्व में आई। जिसे मुसलमान आदम अलैहिस्सलाम कहते हैं। इसके अलावा यहूदियों की एक और मान्यताएं हैं कि उनके एक पैगंबर अब्राहम ने अपने बेटे इसहाक को लेकर अल्लाह के कहने पर बलि देने इसी टेंपल पर पहुंचे थे। लेकिन जब वह बलि दे रहे थे तभी इसहाक की जगह वहां पर एक भेड़ पड़ा था। ईश्वर ने अब्राहम की भक्ति उनकी नियत देखते हुए [संगीत] इसहाक को बख्श दिया था। ऐसी मान्यता की वजह से उस वक्त के इजराइल के राजा किंग सोलेमन ने

करीब [संगीत] 1000 ईसा पूर्व में वहां एक भव्य मंदिर बनवाया जिसे यहूदी फर्स्ट टेंपल कहते हैं। जिसे आगे चलकर 516 ईसा पूर्व में बेबिलोनियन सभ्यता के लोगों ने इस मंदिर को नष्ट कर दिया। लेकिन यहूदियों ने दोबारा इसी जगह पर एक और मंदिर बनाया। वह मंदिर कहलाया सेकंड टेंपल। इस मंदिर के अंदरूनी हिस्से को यहूदी कहते हैं होली ऑफ द होलीज यानी पवित्र से भी पवित्र। यह सेकंड टेंपल करीब 600 साल तक वजूद में रहा। सन 70 में रोमंस ने इसे भी तोड़ दिया। लेकिन इस मंदिर की एक दीवार आज भी मौजूद है। इसे कहते हैं वेस्टर्न वॉल। यह दीवार उस प्राचीन सेकंड टेंपल के बाहरी आहाते का हिस्सा मानी जाती है। हालांकि यहूदियों को यह नहीं पता कि मंदिर का भीतरी हिस्सा यानी वो होलीज ऑफ होलीज टेंपल माउंट के किस हिस्से में स्थित था। क्योंकि प्राचीन समय में आम यहूदियों को वहां जाने की छूट [संगी

त] नहीं थी। इसलिए आज भी कई धार्मिक यहूदी ऊपरी अहाते पर पांव नहीं रखते। वो वेस्टर्न वॉल के पास ही प्रार्थना करते हैं। अब चलिए बात करते हैं मुसलमानों की मान्यताओं के बारे में। इसके इधर मुसलमानों के लिए हरम अल शरीफ यानी जेरूसलम का वो 35 एकड़ का अहता तीसरा सबसे पाक जगह है। पहले नंबर पर मक्का और दूसरे नंबर पर मदीना है। ऐसा माना जाता है कि कुरान के मुताबिक सन 621 की एक रात पैगंबर मोहम्मद एक उड़ने वाले घोड़े जिसका नाम अलबुराक था। उन पर बैठकर मक्का से जेरूसलम आए और यहीं से वह ऊपर जन्नत में चढ़ गए। फिर जन्नत से आने के बाद उन्हें अल्लाह के दिए कुछ आदेश मिले जिसमें बताया गया था कि इस्लाम के कुछ खास अरकान यानी सिद्धांत क्या है? मसलन दिन में पांच वक्त नमाज पढ़ना। सन 632 में पैगंबर मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की वफात के 4 साल बाद मुसलमानों ने जेरूसलम पर हमला कर दिया। तब वहां बेंजेट इन साम्राज्य का शासन था। मुस्लिमों ने जेरूसलम को जीता और आगे चलकर उम्मते खलीफा ने जेरूसलम में एक आलीशान मस्जिद बनवाई जिसका नाम रखा अल अा। अरबी भाषा में अक्सा का मतलब होता है

सबसे ज्यादा दूर। इसी अल अा मस्जिद के सामने की तरफ है एक सुनहरे गुंबद वाली इस्लामिक इमारत। इसे कहते हैं डोम ऑफ द रॉक। मुस्लिम मानते हैं कि सदियों पहले उस रात को उड़ने वाले घोड़े पर सवार पैगंबर मोहम्मद ने जेरूसलम पर पहली बार जहां पांव रखा उसी जगह पर है अल अक्सा मस्जिद और जिस जगह से उठकर वह उस रात जन्नत चढ़े वहीं पर है डोम ऑफ द रॉक और यह दोनों इमारतें जेरूसलम में उसी 35 एकड़ वाले आयताकार जमीन पर है जिसे यहूदी अपने प्राचीन मंदिरों की लोकेशन मानते हैं। मुस्लिम और यहूदी के अलावा ईसाइयों के लिए भी जेरूसलम काफी खास माना जाता है। ईसाइयों की मान्यताएं। ईसाई मानते हैं कि ईसा मसीह ने इसी शहर में अपना उपदेश दिया। यहीं उन्हें सूली पर चढ़ाया गया और यहीं पर वह दोबारा जिंदा हुए। ईसाई यह भी मानते हैं कि एक रोज ईसा वापस दुनिया में लौटेंगे और उनकी इस सेकंड कमिंग में जेरूसलम का अहम किरदार होगा। कुछ इतिहासकारों की मानें तो सबसे प्राचीन मान्यताएं हैं यहूदियों की। सबसे प्राचीन इसलिए क्योंकि क्रिश्चियनिटी और इस्लाम दोनों यहूदी धर्म के बाद आए।

यहूदियों पर हमला किया रोमंस ने। उन्होंने जेरूसलम पर कंट्रोल किया। फिर आए मुसलमान। उन्होंने जेरूसलम को अपने कंट्रोल में लेकर यहां धार्मिक इमारतें बनवाई। फिर आगे चलकर ईसाइयों और मुस्लिमों [संगीत] में धर्म युद्ध शुरू हुआ जिसे क्रूसेट नाम दिया गया। इस फर्स्ट क्रूसेट के तहत जुलाई 1099 [संगीत] इस फर्स्ट क्रूसेट के तहत जुलाई 1099 में ईसाइयों ने जेरूसलम को जीत लिया। लेकिन [संगीत] यह जीत ज्यादा समय तक बरकरार नहीं रही। 1187 में मुसलमानों ने जेरूसलम को वापस हासिल कर लिया और उन्होंने हरमल शरीफ का प्रबंधन देखने के लिए वफ यानी इस्लामिक ट्रस्ट का गठन किया। पूरे कंपाउंड का कंट्रोल इसी ट्रस्ट के हाथ में था और यहां सदियों तक गैर मुस्लिमों को प्रवेश की अनुमति नहीं थी। फिर आया साल 1948 का। इस साल गठन हुआ इजराइल का उसी जमीन पर जहां फिलिस्तीनिज्म पहले से अपना आधार बना रहे थे। इजराइल के गठन के बाद वह चाहते [संगीत] थे कि जेरूसलम उनकी राजधानी बने क्योंकि सबसे पाक जगह उनका टेंपल माउंट यहीं पर है। लेकिन जेरूसलम और टेंपल माउंट पर अधिकार मिलना इतना आसान नहीं था क्योंकि यहूदियों की तरह दुनिया भर के मुसलमानों की भी आस्था इससे जुड़ी थी। मुसलमान पहले ही इजराइल के गठन का विरोध कर रहे थे। ऐसे में जेरूसलम और टेंपल माउंट का कंट्रोल अगर इजराइल को मिल जाता तो भयंकर खून खराबा होता। सा

थ ही साथ यह मुसलमानों के प्रति पक्षपात भी होता। इसको देखते हुए संयुक्त राष्ट्र की देखरेख में दुनिया के बड़े देशों ने एक मसौदा तैयार किया। इसके मुताबिक टेंपल माउंट के प्रबंधन का अधिकार जॉर्डन को दे दिया गया। वह इसका कस्टोडियल बन गए। इस समझौते में एक बड़ा बदलाव यह हुआ कि अब यहूदियों को भी इस परिसर में प्रवेश की अनुमति मिल गई। लेकिन केवल पर्यटक के तौर पर वह कंपाउंड में आ तो सकते थे, लेकिन पूजा पाठ नहीं कर सकते [संगीत] थे। इस फैसले का दोनों तरफ से कट्टरपंथियों ने विरोध किया। कट्टरपंथी मुस्लिम इस परिसर में गैर मुस्लिमों के घुसने से नाराज थे और कट्टरपंथी यहूदी कहते थे कि उनको टेंपल माउंट में प्रार्थना का अधिकार मिले। इसी का नतीजा आया साल 1982 में एललेन गुडमैन नाम का एक इजराइली सैनिक पवित्र परिसर में स्थित डोम ऑफ द रॉक में घुस गया। उसने मशीन गन से फायरिंग शुरू [संगीत] कर दी। इस वारदात में दो लोग मारे गए। इस घटना के बाद यहूदियों और मुसलमानों के बीच तनाव बढ़ गया। इसके बाद यहूदी परिसर के पास वेस्टर्न वॉल के पास प्रार्थना करते तो कई बार परिसर के भीतर से मुस्लिम उन पर पत्थर फेंकते। इसके चलते यहूदियों में भी टेंपल माउंट पर अपना दावा मजबूत करने की जिद बढ़ गई। इसी दावे का एक मशहूर एपिसोड साल 2000 में सामने आया। इस साल इजराइल के पूर्व प्रधानमंत्री एरियल [संगीत] शरन खूब भारीभरकम सुरक्षा के बीच टेंपल माउंट पहुंचे। उनका मकसद था इजराइल का

अधिकार स्थापित करना और इस प्रकरण के चलते भी खूब फसाद हुआ। जेरूसलम में दंगे हुए। आगे चलकर कई सालों तक टेंपल माउंट के इर्द-गिर्द तनाव बना रहा। छिटपुट संघर्ष और जोर आजमाइश की वारदातें होती रही। यह विवाद आज भी जारी है और दोनों तरफ से आए दिन कुछ ना कुछ जंग जैसे हालात बने रहते हैं। जिसका ताजा नमूना हमें गाजा फिलिस्तीन वॉर में देखने को मिला। तो ऐसे में सिर्फ 35 एकड़ के एक

जमीन के टुकड़े की वजह से मुस्लिम, यहूदी और ईसाई जो तीनों अब्राहम की संतान हैं, आपस में एक दूसरे के जाने दुश्मन बन बैठे हैं। नमस्कार, मैं हूं मानक गुप्ता। अगर आपको हमारा यह वीडियो पसंद आया हो तो इसे लाइक और शेयर जरूर करें और हां हमें सब्सक्राइब और फॉलो करना ना भूलें ताकि आप देश और दुनिया की कोई खबर मिस ना करें। तो जुड़े रहिए हमारे साथ और देखते रहिए न्यूज़

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