Khamenei ने तहलका मचाया, Trump की सेना भागी? America अब युद्ध नहीं करेगा!..

क्या खामनी कुछ ऐसा कह रहे हैं कि अगर अमेरिका का हमला हुआ तो कई और मुस्लिम देश भी इसमें कूद सकते हैं?
देखिए खामई साहब जैसा कि मैंने पहले ही आपको बताया है वैभव जी कि ये दरअसल चाहेंगे कि ये जो लड़ाई है वो अरब इजराइल लड़ाई में तब्दील हो जाए। वो अरब इजराइल युद्ध हो जाए। वो हमेशा से ये चाहेंगे क्योंकि अमेरिका इतना बड़ा भीम का राक्षस है कि उनसे अभी लड़ना मुनासिब नहीं है। तो यह जाहिर है कि कामनी साहब है। वो इसे अरब इजराइल लड़ाई का शक्ल देना चाहते हैं। और यह तभी होगा जब वो इस तरीके के बयानात देते हैं या स्टेटमेंट देते हैं कि अगर ऐसी लड़ाई आगे बढ़ी तो कुछ और मुस्लिम कंट्रीज है वो भी इसमें कूद सकते हैं तो वो एक तरीके से मैसेज देना चाहते हैं और अगर ऐसा होता है तो वो अपनी तरह से लीडरशिप भी इस्टैब्लिश करना चाहते हैं मुस्लिम वर्ल्ड में।

तो ये दो खास कारण है कि वो खासकर स्ट्रेटजिकली या डिप्लोमेटिक रूप से इस तरीके के बयानात खाने साहब की ओर से आ रहे हैं। वैभव जी क्या इसे एक तरीके से हम ये भी कह सकते हैं कि ईरान खुद भी चाहता है कि अब जो जंग हो उस जंग में सिर्फ दो ही देश ना रहे और अगर ये जंग में कई और देश शामिल होते हैं तो आप उनके नाम बता सकते हैं कि कौन-कौन से देश शामिल हो सकते हैं और वो किसके पक्ष से शामिल हो सकते हैं। देखिए वैभव जी आज के हालात में कोई भी देश ईरान का साथ नहीं देगा। चाहे वो कितना भी बड़ा दावा करे किसी भी मुस्लिम कंट्री में अमेरिका के खिलाफ जाने की हिम्मत नहीं है। तो कोई भी देश सांस नहीं देने वाला है। इनको तो छोड़िए जो बड़ी महाशक्तियां है वो तक बाहरसे बयानबाजी करेगी। लड़ाई में कोई शामिल नहीं होगा

। ईरान की रक्षा अगर कोई कर सकता है तो वह खुद ईरान ही है। तो देखते हैं कि क्या होता है। बाकी मुझे ऐसा कुछ भी नहीं लगता है कि कोई भी देश ईरान की मदद करने के मूड में है इस समय। जी जी खामने के भाषण में एक अंश मुझे वो भी बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण लगा। उनका कहना था कि जो हालिया विद्रोह हुआ था उसे सिर्फ विद्रोह के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। वो एक तख्खा पलट की कोशिश थी और आईआरजीसी ने उसे सफलतापूक उसे खत्म कर दिया। आपको भी ऐसा लगता है? नहीं मुझे ऐसा नहीं लगता है। यह जरूर है डीप स्टेट तो हमेशा हर जगह सक्रिय होता है। बांग्लादेश से लेकर ईरान तक तो उसकी तो कोई मनाही नहीं है। पर यह कि ये पूरी तरीके से अमेरिका द्वारा प्रायोजित था या वहां से इंटरनल सपोर्ट नहीं था

। ऐसा नहीं कह सकते हैं क्योंकि उसमें हजारों हजारों पपुलेशन उसमें इन्वॉल्व थी। लाखों लोग उस प्रोटेस्ट में शामिल थे। तो इतने बड़ी संख्या में कोई भी डीप स्टेट कहीं के भी पपुलेशन को मैनेज नहीं कर सकता है। ना वहां के एनजीओस और ना ही कोई दूसरे ऑर्गेनाइजेशन। तो यह कहना तो ठीक नहीं है। दूसरी बात है कि ईरान में लगातार महिलाओं की और आम आदमी की आजादी को दबाया गया है। सप्रेस किया गया है। इसमें कोई दो राय नहीं है। तो वहां की जनता में खासकर जो न्यू जनरेशन है जो कि बाहर की दुनिया की हवा खा रही है। उसको बिल्कुल ये जो है वो खासकर जो वर्तमान सरकार था उसके खिलाफ विद्रोह था। असंतोष था और यह है कि अमेरिका के प्रतिबंधों के कारण वहां पर महंगाई काफी बढ़ी हुई है। बाजारों की हालत खराब है। तो ऐसे में आर्थिक असंतोष और उसका परिणाम स्वरूप इस तरीके के विद्रोह और सरकार के खिलाफ प्रदर्शन होने एकदम बिल्कुल जायज बात है। तो इस बारे में खाम साहब का बिल्कुल यकीन नहीं करना चाहिए और ना ही यह जायज लगता है

। वैभव साहब तेजावत जी वर्षगांठ आने वाली है इस्लामिक क्रांति की जो 1979 में बदलाव हुआ था ईरान में और फिर उसके बाद ये सर्वोच्च नेता वाली सत्ता आई उस इस्लामिक क्रांति के बारे में हमारे दर्शकों को थोड़ा बहुत आप बताइए। देखिए यह दरअसल जो इससे पहले की जो सरकार थी जिसमें जो ईरान के शाह होते थे शुरू से ही शाह होते थे मध्यकाल से जब हमारे यहां पे मुगल होते थे तो मुगलों के ईरान के शाह उनसे संबंध होते थे जो हुमायूं थे वो भी वहां ईरान में शरण लेने के लिए गए थे और बाहर के बहुत सारे आक्रमणकारी यहां भारत पर आक्रमण करने के लिए ईरान से भी आए हैं। तो भारत के और उनके संबंध तो काफी पुराने हैं। इसके अलावा यह जो पूरी की पूरी जो सत्ता है वह दरअसल सामंती अवशेष था। तो एक तरीके से देखा जाए तो उसी जो सामंती सत्ताओं को हटा के पहली बार ऐसा हुआ था कि ईरान में एक सेमी डेमोक्रेटिक या अर्थ प्रजातांत्रिक सत्ता की स्थापना हुई थी। पर इसके मूल्य जो थे वो इस्लामिक थे। अब एक तरफ तो आप जो मध्यकालीन शासन सत्ता है उसके खिलाफ लड़ाई लड़ रहे हैं। पर जो नई शासन सत्ता आ रही है वह भी अगर मध्यकालीन मूल्यों पर स्थापित होती है तो उसके लेटर कॉन्सक्वेंसेस होते हैं जो कि अभी हम देख रहे हैं। तो ये जो मध्यकालीन जो सत्ता का जो अवशेष क्योंकि ये उन्होंने जो बनाया था वो मॉडर्न स्टेट था नहीं। धर्म अपने आप में एक मिडवल फिनोमिनन है

। तो मध्यकालीन फेनोमिनन होने के कारण उसके ऊपर तो अगर आप इस्लाम की और मध्यकालीन इस्लाम की बात करेंगे तो फिर पर्दे की भी बात करेंगे। वो तमाम चीजों की बात करेंगे जो कि नई दुनिया के अनुरूप नहीं है। पर ये युवा पीढ़ी है वो मध्यकालीन नहीं है। तो उस समय तक तो चल गया जो पुराने स्टाइल का जो ढांचा है जिसमें खमानी साहब एक अकेले आदमी है जैसे कि एक राजा होता है पूरी रियासत का वही हालात में है। तो बिल्कुल जनता का जो विद्रोह है ऐसे ही राजा के खिलाफ है। तो इसी तरह की ये ढांचे की मध्यकालीन सत्ता है। जो शिया लोग हैं वो कंपेरेटिवली एक तरीके से देखा जाए तो हेमेटिक और सेमेटिक जो दो रिलजन होते हैं तो वो हेमेटिज्म के ज्यादा नजदीक है। सेमेटिज्म के थोड़ा सा कम करीब है। वैभव जी