साल 2003 में डेविड धवन ने एक मूवी बनाई थी। नाम एक और एक 11। मूवी जैसी भी थी उसमें एक गाना था ओ दुश्मना। वही गाना जिसमें गोविंदा का किरदार एक व्हीलचेयर पर बैठा हुआ है। जब भी हीरोइन उसकी ओर नहीं देख रही है वो चुपके से उठकर गाने पर डांस करने लग रहा है। यह गाना या इसकी क्लिप आपने हाल फिलहाल में देखी होगी। वजह स्टीवन हॉकिंग का एप्सन फाइल में नाम आना। लोगों ने यह गाना इस आशय में शेयर किया कि एपस्टीन के घर जोरो रेंज पर पहुंचने के बाद स्टीवन हॉकिंग ऐसा ही कुछ करने लगते होंगे। सच क्या है? किसी को नहीं मालूम लेकिन तस्वीरें थी एप्सन हॉकिंग साथ में। बस इतना ही थ्योरी बनने और सवाल उठाने के लिए काफी था क्योंकि जेफरी एपस्टीन घोषित तौर पर छोटे बच्चों का देह व्यापारी और बलात्कारी था और उसके साथ तस्वीर होने पर सवाल उठना लाजिम है। लेकिन इस तस्वीर से इत्र भी स्टीफन हॉकिंग की एक शख्सियत थी। एक काबिल वैज्ञानिक और एक किंचित कम काबिल इंसान की। तो स्टीफन हॉकिंग थे कौन और यह एप्सन वाला मामला क्या है? आज के वीडियो में यही सब बात करते हैं।
सबसे पहले तो यह कि एपस्टीन वाला मसला क्या है? आपको पता ही है कि जेफरी एपस्टीन के ऊपर सेक्स ट्रैफिकिंग का केस चल रहा था। आरोप था कि वो अपने प्राइवेट आइलैंड पर नाबालिग लड़कियों का शोषण करता था। बड़ी-बड़ी हस्तियां उसकी क्लाइंट्स थी। अब एप्सन और हॉकिंग के बीच कनेक्शन क्या था? कई रिपोर्ट्स का दावा है कि हॉकिंग का नाम एप्सन फाइल्स [संगीत] में 200 से ज्यादा बार आता है। कुछ तस्वीरें भी हैं जिनमें हॉकिंग एपस्टीन की मेहमान नवाजी का लुत्फ उठाते दिख रहे हैं। उन पर आरोप लगे कि वो एप्सन के प्राइवेट आइलैंड पर उल्टी सीधी गतिविधियों में शामिल थे। इसी बात पर एपस्टीन ने अपनी पार्टनर गिलेन मैक्सवेल को एक ईमेल लिखा। अगर वर्जनिया के परिवार या दोस्तों में से कोई आगे आकर हॉकिंग पर लगे इल्जामों को झूठा साबित करे तो उसे कुछ इनाम ऑफर किया जाए। ध्यान दें कि वर्जनिया एपस्टीन केस की एक सर्वाइवर हैं। जिनके मुकदमे का परिणाम ही है कि आज एप्सन फाइल्स दुनिया के सामने हैं। मगर मुद्दा यह भी है कि हॉकिंग का नाम देखकर क्यों लोगों को इतना झटका लगा है। मतलब नाम तो और भी है ही बड़े नेताओं के, बिजनेसमैन के फिर हॉकिंग के नाम पर यह मीम्स क्यों? इसका जवाब भी शायद नाम में ही छिपा है। [संगीत] स्टीफन हॉकिंग ऐसा शख्स जिसको 21वीं सदी का सबसे जीनियस साइंटिस्ट कहते हैं। उन्हें कोई नोबेल प्राइज तो नहीं मिला लेकिन कहते हैं कि यह नुकसान हॉकिंग का नहीं बल्कि नोबेल का है। हॉकिंग के जीनियस की कहानी यूं तो सही मायने में शुरू होती है जब वो 21 साल के थे। उनके टीचर्स उन्हें एक खास स्टूडेंट मानते थे। उन्हें ऑक्सफोर्ड के यूनिवर्सिटी कॉलेज में फिजिक्स की पढ़ाई के लिए स्कॉलरशिप [संगीत] भी मिली थी।
लेकिन वह खुद अपने काम को बहुत ज्यादा सीरियसली नहीं लेते थे। ऐसा रजर पेनरोस ने अंग्रेजी अखबार द गार्डियन में छपे अपने आर्टिकल में कहा है। पेनरोस खुद फिजिक्स में नोबेल जीत चुके हैं और हॉकिंग के साथ काम भी कर चुके हैं। शुरू में तो हॉकिंग वैसे ही थे जैसे बहुत इंटेलिजेंट और पैशनेट रिसर्चर्स होते हैं। लेकिन उनके इस पैशन का असली इम्तिहान तब हुआ जब 21 साल की [संगीत] उम्र में उन्हें एक गंभीर बीमारी हो गई। एएलएस एमोट्रोफिक लेटरल स्क्लेरोसिस। [संगीत] आसान भाषा में कहें तो उनके दिमाग और रीड की हड्डी के न्यूरॉन या नर्व सेल्स ने काम करना बंद कर दिया। इसमें आदमी हिल नहीं पाता, हाथ नहीं चला पाता, खुद चल नहीं पाता। यहां तक कि सांस लेना भी मुश्किल हो जाता है। हमें और आपको अगर एक दिन छींक आ जाए, बुखार आ जाए तो हम लोग ऑफिस से कॉलेज से छुट्टी कर लेते हैं। एएलएस ऐसी बीमारी है जो समय के साथ इंसान को और ज्यादा तोड़ देती है। साल 1963 में हॉकिंग को जब पैरालिसिस का झटका लगा तो किसी को भी लगा होगा कि अब उनकी जिंदगी खत्म। उनके साथियों को लगा कि अब पीएचडी तो नहीं हो पाएगी। डॉक्टरों ने कहा कि यह कुछ ही साल के मेहमान हैं और यह बात सच साबित तो हुई मगर पूरे 55 साल बाद। हॉकिंग की रफ्तार यह बीमारी रोक नहीं पाई लेकिन 1985 में उन्हें एक और झटका लगा। [संगीत] उन्हें इतना भयानक निमोनिया हुआ कि सांस लेना मुश्किल हो गया।
उनकी जान बचाने के लिए डॉक्टरों को उनके गले में ऐसी सर्जरी करनी पड़ी कि हॉकिंग की बची हुई आवाज भी चली गई। मगर साइंटिस्ट का दिमाग वो तो स्यूशन ढूंढने में लगा रहता था। अपने ख्याल जाहिर करने के लिए हॉकिंग ने एक मशीन का सहारा लिया। यह उनके चेहरे में होने वाले मूवमेंट को सेंस करती थी। इससे उनकी बात पहले टेक्स्ट और फिर स्पीच बनकर [संगीत] सामने वाले तक पहुंचती थी। इधर हॉकिंग ने अपना पूरा फोकस ब्रह्मांड की अनसुलझी पहेलियों को सुलझाने में झोंक दिया। इन 55 साल में हॉकिंग ने एक से बढ़कर एक थ्यरीज दी और ब्लैक होल जैसी चीजों के बारे में विज्ञान की दुनिया को चौंका के रख दिया। जिन्हें नहीं पता उन्हें बता दें कि ब्लैक होल्स स्पेस में एक ऐसी जगह होती है जहां ग्रेविटी इतनी स्ट्रांग होती है कि उसमें जो दाखिल हो वापस नहीं लौट पाता। यहां तक कि लाइट भी नहीं। एएलएस से 10 साल तक गुजरने के बावजूद 1973 में हॉकिंग ने कई पेपर्स रिलीज किए। ब्लैक होल्स और बिग बैंग पर जबरदस्त फाइंडिंग्स थी। रिसर्च जर्नल नेचर में हॉकिंग पर साल 2018 में एक आर्टिकल आया था। इसे ब्रिटिश कॉस्मोलॉजिस्ट और एस्ट्रोफिजिसिस्ट मार्टिन रीस ने लिखा था। मार्टिन लिखते हैं कि 1974 में ब्लैक होल के इवेंट होराइजन पर काम ने हॉकिंग को लंदन की रॉयल सोसाइटी में जगह दिलाई। तब वो महज 32 साल के थे। इवेंट होराइजन टर्म एक बाउंड्री के लिए इस्तेमाल किया जाता है।
यह बाउंड्री ब्लैक होल की होती है। अगर कोई चीज ब्लैक होल में जा रही हो तो इवेंट होराइजन के पहले तक तो वो वापस आ सकती है। लेकिन एक बार उसको पार कर लिया तब तो गई नो रिटर्न टिकट। हॉकिंग ने अपनी कैलकुलेशन से यह बताया कि इस इवेंट होराइजन का आकार स्फेरिकल या एक गेंद की तरह होता है। इसको ऐसे समझिए कि जैसे एक गेंद है तो उसकी सतह इवेंट होराइजन है। उसके ऊपर किसी चीज को आप रखिए तो किसी भी पल हटा सकते हैं। लेकिन गेंद के अंदर एक बार कोई चीज चली गई तो फिर वो वापस नहीं आ सकती। मार्टिन अपने आर्टिकल में बताते हैं कि हॉकिंग 1974 तक एकदम कमजोर हो गए थे। मूवमेंट नहीं हो रहा था। बोल नहीं पा रहे थे। तब भी सबको लग रहा था कि अब वो ज्यादा दिन तक रिसर्च कर नहीं पाएंगे। लेकिन हॉकिंग का काम अभी पूरा कहां हुआ था? वो खुद भले ही नहीं चल पा रहे थे लेकिन उनका दिमाग दौड़ रहा था। उन्होंने एक ऐसी थ्योरी दी कि ब्लैक होल की सबसे बेसिक पहचान पर ही सवाल खड़ा हो गया। हमने जैसे आपको पहले बताया कि ब्लैक होल से कुछ भी बाहर नहीं आता। लेकिन हॉकिंग ने दिखाया कि ऐसा नहीं है। ब्लैक होल्स अपनी ही जगह पर रोटेट करते रहते हैं यानी घूमते रहते हैं। हॉकिंग ने कहा कि इस रोटेशन से जो एनर्जी पैदा होती है वो तो बाहर निकलती ही होगी।
यानी ब्लैक होल असल में पूरी तरह ब्लैक नहीं होगा बल्कि एक फिक्स टेंपरेचर पर इससे एक रेडिएशन बाहर आता होगा। इसको हॉकिंग रेडिएशन कहा गया। जब हॉकिंग रेडिएशन की थ्योरी सामने आई तो इस पर खूब माथापच्ची हुई। हार्व यूनिवर्सिटी के थरिस्ट एंड्रू स्ट्रोमजर ने तो यहां तक कह दिया कि हॉकिंग के एक पेपर ने थ्यरेटिकल फिल्सिस्ट्स की सबसे ज्यादा नींदें उड़ा रखी हैं। अब सवाल यह था कि ब्लैक होल में जो चीजें गिरती हैं उनकी इंफॉर्मेशन हमेशा के लिए गायब हो जाती है या इस रेडिएशन पर बैठकर लौट आती है। हॉकिंग शुरू में यही मानते थे कि ब्लैक होल के अंदर जाने वाली सभी जानकारी खत्म हो जाती है। लेकिन साल 2004 में चीजें पलट [संगीत] गई। हॉकिंग के साथ ही थे जॉन प्रिस्किल। वो भी थ्योरेटिकल फिजिसिस्ट हैं। उन्होंने हॉकिंग को याद करते हुए टाइम मैगजीन में एक आर्टिकल लिखा है। दोनों के बीच में खूब डिस्कशंस होते थे और बीच-बीच में प्रिस्टिल हॉकिंग को चैलेंज कर देते थे। हॉकिंग को इसमें बड़ा मजा आता था और वो अपने ही अंदाज में तपाक से पूछते थे। लगी शर्त और यहां से नीव पड़ जाती थी किसी बड़ी रिसर्च की। ऐसे ही एक शर्त हॉकिंग हार गए। प्रिस्कल से यह शर्त हॉकिंग और थ्योरेटिकल फिजिसिस्ट किप थर्ड ने लगाई थी। कौन किप थोनर्न? आपने क्रिस्टोफर नोलेलन की मूवी इंडस्टार देखी है?
किप थोड उस फिल्म के साइंटिफिक कंसलटेंट थे। बहरहाल इन तीनों में जो शर्त लगी वो उसी इंफॉर्मेशन के बारे में थी जो ब्लैक होल में जाती है। 2004 में स्वीडन में एक कॉन्फ्रेंस हुई। 500 से ज्यादा वैज्ञानिकों और मीडिया का हुजूम लगा। हॉकिंग स्टेज पर जाते हैं और ऐलान कर देते हैं। मैं बताना चाहता हूं कि मुझे ऐसा लगता है मैंने थ्यरेटिकल [संगीत] फिजिक्स की एक बड़ी प्रॉब्लम सॉल्व कर दी है। सब हैरान हैं क्या बोल रहे हैं ये? हॉकिंग इस मंच पर यह मान लेते हैं कि ब्लैक होल में जाने वाली इंफॉर्मेशन पर उनकी सोच बदल गई है। वो बताते हैं कि जो कुछ भी ब्लैक होल में जाता है उसकी एक बेसिक जानकारी वापस लौट कर आती है। वो हमेशा के लिए गायब नहीं होती है। दुनिया का सबसे मशहूर वैज्ञानिक [संगीत] एक मंच पर जाता है। बताता है कि वो शर्त हार गया है और यह भी कि उसकी खुद की सोच अब तक गड़बड़ डायरेक्शन में चल रही थी। हॉकिंग का नेचर ऐसा ही था। एकदम अतरंगी। ऐसे ही एक बार साल 2009 में उन्होंने एक पार्टी दी। सब इंतजाम कर लिया और पार्टी का न्योता भेजा एक दिन बाद। इसलिए नहीं कि वो भूल गए थे। बल्कि इसलिए कि वो यह साबित करना चाहते थे कि भाई टाइम ट्रैवल जैसा कुछ नहीं होता। अगर टाइम ट्रैवल होता तो भविष्य से कोई ना कोई तो इस पार्टी में शिरकत करता ही। हॉकिंग का मानना था कि टाइम ट्रैवल से अपने पास्ट में बीते हुए कल में जाना पॉसिबल नहीं है। भविष्य में जा सकते हैं उसके लिए हाई स्पीड ट्रैवल जैसी टेक्नोलॉजी चाहिए होगी।
बस लेकिन पास्ट में नहीं जा सकते। क्यों? ऐसे समझिए कि मान लीजिए आप अपने पास्ट में जाते हैं। पास्ट में जाकर आप अपने किसी पूर्वज को मार देते हैं या बेसिकली कोई भी ऐसा काम करते हैं जिससे आपके पैदा होने की गुंजाइश ही खत्म हो जाए। तो यह कैसे मुमकिन होगा? क्योंकि आप पैदा तो हो ही चुके हैं। अगर आप पैदा हुए ही नहीं तो पास्ट में जाएंगे कैसे? और गए ही नहीं तो मारेंगे कैसे? समझ रहे हैं? कोई सेंस नहीं बनेगा। सब आपस में कंट्राडिक्शन है। तो पास्ट में टाइम ट्रेवल तो पॉसिबल ही नहीं है। फ्यूचर का क्या? हमारी दुनिया का पृथ्वी का भविष्य क्या होगा? मशहूर एस्ट्रोफिजिसिस्ट नील डिग्रास टाइससन ने अपने शो स्टार टॉक में हॉकिंग से इस पर सवाल किया। उन्होंने पूछा कि हम जो धरती पर इंसानों को बचाने के लिए दूसरे ग्रहों पर जीवन की तलाश कर रहे हैं वो ज्यादा महंगा नहीं है। उससे सस्ता तो होगा कि कोई एस्टेरॉइड आ रहा है तो उसको रास्ते में ही उड़ाने की टेक्नोलॉजी पर काम करें। इस पर हॉकिंग ने जवाब दिया कि एस्टेरॉइड तो आज हमारी चिंता है ही नहीं। इंसानी जीवन को खतरा न्यूक्लियर वॉर, क्लाइमेट चेंज और पोल्यूशन से है। पूरी आबादी को मंगल पर ना भेजें लेकिन एक अलग सभ्यता किसी और ग्रह पर बसाएं जो खुद अपना ध्यान रख सके। सेल्फ सफिशिएंट हो। बार-बार धरती से आना जाना ना हो। ऐसा कर लेते हैं तो किसी बड़ी प्रलय जैसी स्थिति में इंसान के अस्तित्व को बचाने की उम्मीद बनी रहेगी। हॉकिंग अपने वक्त से कहीं आगे सोचते थे। ब्लैक होल के इवेंट होराइजन के एरिया पर हॉकिंग ने जो थ्योरी दी वो 2017 में साबित भी हो गई।
हॉकिंग रेडिएशन का कोई पुख्ता सबूत तो अभी नहीं मिला है लेकिन [संगीत] 2023 में कुछ न्यूट्रिनोस ऑब्जर्व किए गए थे। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह किसी ब्लैक होल में हुए धमाके से ही निकले थे। यह हॉकिंग रेडिएशन से ही जुड़ा हुआ है। तमाम ग्राउंड ब्रेकिंग थ्योरीज देने के बावजूद हॉकिंग को कभी नोबेल पुरस्कार नहीं मिला। इसलिए नहीं कि उनकी थ्यरीज में दम नहीं था बल्कि इसलिए क्योंकि नोबेल थ्यरीज के लिए मिलता ही नहीं है। नोबेल मिलता है जब थ्यरीज प्रूव हो जाती हैं। इवेंट होराइजन के एरिया वाली थ्योरी हॉकिंग के निधन के 7 साल बाद साबित हो सकी। आज हॉकिंग का नाम एपस्टीन के काले इतिहास की किताब में गाढ़ी स्याही से लिखा दिख रहा है।