UAE दुबई पर ईरान के हमले के बाद अरबपति खलफ अल हब्तूर ने ट्रंप, अमेरिका पर खूब बरसाए!
[संगीत] ईरान वर्सेस अमेरिका और इजराइल की यह जंग कब खत्म होगी किसी को नहीं पता। इस जंग को लेकर अब जानकार यह तक कहने लगे हैं कि आननफानन में ट्रंप ने युद्ध तो शुरू कर दिया लेकिन इसका खामियाजा खाड़ी देशों को भुगतना पड़ रहा है। ईरान मिडिल ईस्ट के दूसरे देशों को लगातार निशाना बना रहा है। ईरान की ओर से यहां मौजूद अमेरिकी ठिकानों पर हमले का सिलसिला जारी है। इसके चलते खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्था को गंभीर नुकसान पहुंच रहा है। इसी बीच अब देश
के अंदर से ही ट्रंप के विरोध में आवाजें उठने लगी है। खाड़ी देश में बढ़ते तनाव के बीच संयुक्त अरब अमीरात के दिग्गज कारोबारी खलफ अल हबतूर ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। अल्हबतूर ने ट्रंप को एक खुला पत्र लिखकर सीधे सवाल किया कि आखिर उन्हें इस क्षेत्र को युद्ध में घसीटने का हक किसने दिया? दुबई के बिलियनर और अलहतूर ग्रुप के चेयरमैन खलब अहमद अलहतूर का एक सोशल मीडिया पोस्ट इस समय दुनिया भर में चर्चा का विषय बना हुआ है। ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते सैन्य तनाव पर अपनी चिंता जाहिर करते हुए अलहतूर ने राष्ट्रपति ट्रंप को टैग करते हुए उनसे तीखे सवाल किए। 500 से भी ज्यादा अधिक शब्दों की एक लंबी चौड़ी पोस्ट में उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से कई बड़े सवाल किए। इनमें
सबसे पहला सवाल था कि हमारे क्षेत्र को युद्ध में घसीटने का हक आपको किसने दिया? दूसरा सवाल था कि आपने किस आधार पर यह खतरनाक फैसला लिया? तीसरा कि आपने ट्रिगर दबाने से पहले होने वाले नुकसान का आकलन किया था? अपने पोस्ट में अलहतूर ने लिखा, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक सीधा सवाल। आपको हमारे क्षेत्र को ईरान के साथ युद्ध में घसीटने का अधिकार किसने दिया? और आपने यह खतरनाक फैसला किस आधार पर लिया? क्या आपने गोली चलाने से पहले इसके संभावित परिणामों पर विचार किया? क्या आपने सोचा
था कि इस तनाव से सबसे पहले प्रभावित होने वाले देश इस क्षेत्र के ही होंगे? इस क्षेत्र के लोगों को भी यह पूछने का अधिकार है? क्या यह आपका अकेला फैसला था? या यह नितिन याू और उनकी सरकार के दबाव का नतीजा था? आपने खाड़ी सहयोग परिषद के देशों और अरब राज्यों को ऐसे खतरे के केंद्र में डाल दिया है जिसे उन्होंने खुद नहीं चुना। ईश्वर का शुक्र है हम मजबूत हैं और अपनी रक्षा करने में सक्षम हैं और हमारे पास अपनी मातृभूमि की रक्षा करने वाली सेनाएं और रक्षा प्रणालियां हैं। लेकिन सवाल यह है आपको हमारे क्षेत्र को युद्ध क्षेत्र में बदलने का अधिकार किसने दिया? शांति और स्थिरता के नाम पर घोषित शांति बोर्ड की पहल पर हस्ताक्षर होने से पहले ही इसने एक ऐसे सैन्य
तनाव को जन्म दिया है जो पूरे क्षेत्र को खतरे में डाल रहा है। वो पहले कहां गई? शांति के नाम पर किए गए वादों का क्या हुआ? वो पहले कहां गई? शांति के नाम पर किए गए वादों का क्या हुआ? इन पहल के लिए आवंटित अधिकांश धनराशि इसी क्षेत्र के देशों से आई। जिनमें खाड़ी अरब देश भी शामिल हैं। जिन्होंने स्थिरता और विकास को बढ़ावा देने के लिए अरबों डॉलर का योगदान दिया। आज इन देशों को यह पूछने का पूरा अधिकार है। यह पैसा कहां गया? क्या हम शांति पहलों को फाइनेंस कर रहे हैं या एक ऐसे युद्ध को जो हमें खतरे में डालता है। इससे भी
अधिक खतरनाक बात यह है कि आपका निर्णय ना केवल इस क्षेत्र के लोगों को बल्कि अमेरिकी जनता को भी खतरे में डालता है जिनसे आपने शांति और समृद्धि का वादा किया था। आज वह अपने करों से वित्तपोषित एक युद्ध में उलझे हुए हैं। जिसमें अकेले प्रत्यक्ष सैन्य अभियानों पर ही 40 से 65 अरब डॉलर खर्च हो रहे हैं। जैसा कि इंस्टट्यूट ऑफ पॉलिसी स्टडीज आईपीएस का कहना है। यदि युद्ध 4 से 5 सप्ताह तक चलता है तो आर्थिक प्रभावों और अप्रत्यक्ष नुकसान को मिलाकर यह राशि 210 अरब डॉलर तक पहुंच सकती है। इस युद्ध में अमेरिकी नागरिकों की जाने भी गई हैं। जबकि यह युद्ध उनका नहीं है। आपने युद्धों से बचने और अमेरिका को सर्वोपरि रखने के अपने वादे भी तोड़ दिए और अपने दूसरे कार्यकाल में सात देशों सोमालिया, इराक, यमन, नाइजीरिया, सीरिया, ईरान और वेनेजुएला में विदेशी सैन्य हस्तक्षेप का आदेश दिया। साथ ही कैरेबियन और पूर्वी प्रशांत महासागर में नौसैनिक अभियान भी चलाए। आपने अपने पहले वर्ष में 658 से अधिक विदेशी हवाई हमले किए जो बाइडन के पूरे कार्यकाल में हुए हमलों
की कुल संख्या के बराबर है। वही बाइडन जिनकी आपने अमेरिका को विदेशी युद्धों में उलझाने के लिए आलोचना की थी। राष्ट्रपति महोदय इन आंकड़ों का अमेरिकियों के बीच आपकी लोकप्रियता पर गहरा प्रभाव पड़ा है जो आपके दूसरे कार्यकाल की शुरुआत से ही गिर गई है। मात्र 400 दिनों में 9% की गिरावट। यह आंकड़े बहुत कुछ कहते हैं। अमेरिका के भीतर भी एक और युद्ध में घसीटे जाने और अमेरिकी जीवन, अर्थव्यवस्था और भविष्य को खतरे में डालने को लेकर चिंता बढ़ रही है। सच्चे नेतृत्व का माप युद्ध छेड़ने के निर्णयों से नहीं बल्कि बुद्धिमत्ता, दूसरों के प्रति सम्मान और शांति की खोज से होता है। यदि यह पहल शांति के नाम पर शुरू की गई थी, तो हमें मांग करने का अधिकार है। इस बारे में अलहतूर ने चेतावनी दी है कि इस तनाव का सबसे बुरा असर जीसीसी यानी खाड़ी सहयोग परिषद के देशों और उनकी अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि अरब देशों को ऐसे खतरे के बीच
धकेल दिया गया है जो उन्होंने चुना तक नहीं था। इस मुद्दे पर सीएनएन से बात करते हुए अलहतूर ने अपनी नाराजगी जाहिर की। उन्होंने कहा कि क्षेत्र की स्थिरता और सुरक्षा दाव पर है। अलहतूर ने मीडिया से बात करते हुए कहा हमारी अर्थव्यवस्था, हमारी सुरक्षा और हमारे लोगों की स्थिरता कोई अखाड़ा नहीं है जहां महाशक्तियां अपना हिसाब बराबर करें। हम शांति के पक्षधर हैं। लेकिन आज हम उस तनाव की कीमत चुका रहे हैं जिसे हमने पैदा नहीं किया। इस दौरान अलहदूर ने बोर्ड ऑफ पीस यानी शांति पहल पर भी सवाल उठाए। उन्होंने पूछा कि शांति का दावा करने के बाद भी यह सैन्य टकराव आखिर क्यों हो रहा है? उन्होंने यह भी आशंका जताई कि क्या यह फैसला ट्रंप का अपना है या फिर यह किसी बाहरी दबाव का असर है? फिलहाल अलहतूर ने इन सवालों के साथ अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। अब यह देखना होगा कि इस बारे में क्या वाइट हाउस की ओर से इन गंभीर सवालों का जवाब आता है या नहीं। बहरहाल मिडिल ईस्ट से जुड़ी सटीक और सही खबरों
के लिए आप देखते रहिए लाइव हिंदुस्तान। हिंद महासागर की लहरों के बीच एक ऐसी जंग छिड़ गई है जिसने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के समीकरण बदल दिए हैं। एक तरफ दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति अमेरिका है जिसने ईरान के युद्धपोत आईआरआईएस डीना को टॉर्पिडो अटैक से समंदर की गहराइयों में दफन कर दिया। लेकिन असली कहानी हमले के बाद शुरू हुई। जब अमेरिका ने श्रीलंका पर दबाव बनाने की कोशिश की। मगर जवाब में उसे वह मिला जिसकी उम्मीद शायद पेंटगन ने कभी नहीं की थी। क्या है पूरा मामला? मामला हिंद महासागर का है। जहां श्रीलंका के गैलेब दरगाह से महज 19 नॉटिकल मील दूर अमेरिकी पनडुब्बी ने ईरानी युद्धपोत आईआरआईएसडीना को निशाना बनाया। इस भयानक टॉर्पिडो हमले में 87 ईरानी नौसैनिकों की मौत हो गई। अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेक्सेथ ने इस ऑपरेशन को क्वाइट डेथ यानी खामोश मौत
करार दिया। बताया जा रहा है कि यह हमला ईरान के खिलाफ डॉन्ड ट्रंप प्रशासन के आक्रामक सैन्य अभियान का हिस्सा था। इस हमले के बाद हड़कंप मच गया। इस दौरान ईरान का एक और सहायक जहाज आईआरआईएस बुशर श्रीलंका के विशेष आर्थिक क्षेत्र में फंस गया। [संगीत]


