संगीत] इजराइल के तेल अवीब एयरपोर्ट पर वो तस्वीर हम सब ने देखी। बाहें फैलाई गई और इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने पीएम मोदी को गले लगा लिया। यह दोस्ती पुरानी है। केमिस्ट्री भी जबरदस्त है। लेकिन इस बार की यह गर्मजशी सिर्फ दोस्ती तक सीमित नहीं है। इसके पीछे एक बहुत बड़ा जिओपॉलिटिकल प्लान है। एक ऐसा प्लान जिसे नेतन्या ने नाम दिया है हेक्सागन। जी हां, छह कोनों वाला एक ऐसा सुरक्षा घेरा जिसके केंद्र में
नेतन्या भारत को देख रहे हैं। आखिर क्या है यह हेक्सागन और क्यों इजराइल को अपनी सुरक्षा के लिए अब भारत की इतनी सख्त जरूरत पड़ गई है? आज बात इसी पर करेंगे। नमस्कार, मैं हूं सिद्धार्थ प्रकाश। सबसे पहले तो यह शब्द पकड़िए। हेक्सागन। आसान भाषा में कहें तो षट्कोण। बेंजामिन नेतन्या ने पीएम मोदी के आने से ठीक पहले एक विज़ दुनिया के सामने रखा। उनका
कहना है कि वह मिडिल ईस्ट के इर्द-गिर्द अलायंस यानी गठबंधनों का एक पूरा सिस्टम बनाना चाहते हैं। इसमें छह तरह के देश शामिल होंगे। पहला भारत जिसे उन्होंने ग्लोबल पावर कहा है। दूसरे अरब देश, तीसरे अफ्रीकी देश, चौथे ग्रीस और साइपस जैसे मेडिटेरेनियन देश और बाकी एशिया के कुछ और देश। अब अगर आप नक्शे पर नजर डालें तो यह बिल्कुल वैसा ही नक्शा है जैसा आईएमईसी यानी इंडिया मिडिल ईस्ट यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर का था। लेकिन नेतन्या का मकसद सिर्फ व्यापार नहीं है। वो साफ
कह रहे हैं कि यह गठबंधन रेडिकल दुश्मनों के खिलाफ होगा। उनका इशारा शिया और सुन्नी एक्सिस की तरफ है। यानी आसान शब्दों में कहें तो ईरान और उसके प्रोक्सी गुटों के खिलाफ एक लोहे की दीवार खड़ी करना। [संगीत] अब सवाल यह है कि नेतन्या भारत को इसमें क्यों शामिल करना चाह रहे हैं? नेतन्या ने पीएम मोदी को पर्सनल फ्रेंड कहा है। लेकिन दोस्ती अपनी जगह है और कूटनीति अपनी जगह। किंग कॉलेज लंदन के प्रोफेसर एंड्रियास क्रेक का मानना है कि इजराइल दरअसल खुद को घिरा हुआ [संगीत] महसूस कर रहा है। उसे लगता है कि अगर भारत जैसा ग्लोबल पावर उसके साथ खुलकर खड़ा हो गया तो ईरान, तुर्किए और दूसरे दुश्मनों को कड़ा संदेश जाएगा।
नेतन्या चाहते हैं कि भारत इस हेक्सागन का एंकर बने। यानी वो धुरी जिसके भरोसे यह पूरा गठबंधन टिका हो। लेकिन यहां भारत के लिए मामला इतना सीधा नहीं है। हम इजराइल के दोस्त जरूर हैं और पीएम मोदी का यह दूसरा इजराइल दौरा बहुत ऐतिहासिक है। 2017 के बाद वो दोबारा वहां गए हैं। लेकिन भारत की विदेश नीति हमेशा से किसी भी गुट में बंधने की नहीं रही है। हम इजराइल के दोस्त हैं तो हम ईरान के साथ भी अच्छे रिश्ते रखते हैं। सऊदी अरब के साथ हमारी स्ट्रेटेजिक पार्टनरशिप बढ़ रही है। हम रूस और अमेरिका दोनों को साथ कर चलते हैं। एक्सपर्ट्स चेतावनी दे रहे हैं कि अगर भारत नेतन्या के इस सिक्योरिटी अलायंस का हिस्सा बनता है तो यह रीजनल पोलराइजेशन को बढ़ा देगा। यानी दुनिया और ज्यादा बट जाएगी। इससे इजराइल के दुश्मनों को यह कहने का मौका मिल जाएगा कि देखो भारत भी अब हमें घेरने की साजिश में शामिल है। हालांकि भारत की अपनी प्राथमिकताएं एकदम क्लियर हैं। पीएम मोदी वहां जंग लड़ने या गुट बनाने नहीं गए हैं। भारत का इंटरेस्ट है डिफेंस, टेक्नोलॉजी, इनोवेशन और ट्रेड। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर दोनों देश मिलकर काम करना चाहते हैं। यरूशलम में इनोवेशन इवेंट होने वाला है। हमारे लिए इजराइल तकनीक की
खान है और इजराइल के लिए भारत एक बहुत बड़ा बाजार। तो कुल मिलाकर तस्वीर यह है कि नितन्याहू चाहते हैं सुरक्षा का हेक्सागन। जबकि भारत चाहता है विकास का कॉरिडोर। अब पीएम मोदी वहां पहुंच चुके हैं। गले मिल चुके हैं। अब देखना दिलचस्प होगा जब बंद कमरों में बात होगी तो क्या भारत इस हेक्सागन में फिट होता है या फिर अपनी पुरानी सबका मित्र वाली नीति पर कायम रहता है।