अली खामेनेई के बाद अगला सुप्रीम लीडर कैसे चुना जाएगा, ईरान में सत्ता का खेल कैसे चलता है? ट्रंप

ईरान को हम थियोक्रेसी कहते हैं। इसका मतलब कि अल्टीमेट जो ताकत है, पॉलिटिकल ताकत हो, मिलिट्री ताकत हो, इस तरह के सारे डिसीजंस लेने की जो ताकत है, वो सुप्रीम लीडर के पास है। सुप्रीम लीडर कौन बन सकता है? सुप्रीम लीडर वही इंसान बन सकता है जिसने शिया इस्लाम के की पढ़ाई इस हद तक करी है। इस लेवल तक करी है कि वो आया का दर्जा हासिल कर चुके हैं। किसी भी वक्त पर देखिए आज भी शायद अगर आप देखें तो 11 ऐसे इंसान है जो आयातुल्लाह के लेवल पर पहुंच चुके

हैं। जैसे ही एक इंसान आया बनता है तो वो एक बहुत छोटी सी काउंसिल है जिसका मेंबर बन जाते हैं। उनको कहते हैं गार्डियन काउंसिल। गार्डियन काउंसिल का काम यह है कि वो शिया इस्लाम की जितने भी प्रिंसिपल्स हैं उनको देखते हुए सुनिश्चित करें कि ईरान में कोई भी सरकारी डिसीजन ऐसा ना हो जो इस्लाम के खिलाफ जाता है। इसी गार्डियन काउंसिल के अंदर से सुप्रीम लीडर निकलते हैं। 1979 के बाद से अब तक सिर्फ दो सुप्रीम लीडर हुए हैं। एक तो जो रेवोल्यूशन के लीडर थे आयतुल्लाह खमे जब वो 1989 में वो मरे तो उसके बाद इसी गार्डियन काउंसिल के अंदर से आया खामनाई बने सुप्रीम लीडर। इलेक्शन का

प्रोसेस क्या है? यह हमें नहीं पता। वेटिकन के बारे में जो पोप को इ करने का जो तरीका होता है वो जग जाहिर है कि सीक्रेट बैलेट होता है। जब तक वो नहीं जीतते तो सारे बैलेट को जला दिया जाता है। काला धुआं निकलता है और जैसे ही कोई जीतता है तो उसमें ऐसा पाउडर मिलाया जाता है कि सफेद धुआं निकले और चिमनी से सफेद धुआं निकलता देख के हमें समझ में आता है कि कोई एक पोप इ हो गया है। कोई चिमनी नहीं है तेहरान में। कोई धुआं नहीं निकलता है। सिर्फ हमें बता दिया जाता है कि यह नए आया है। तो 11 आया के बीच पॉलिटिक्स चलती है और उनके बीच ये देखा जाता है और ये सिर्फ कयास लगाया जाता है कि कौन सबसे ज्यादा पावर ताकतवर है। कौन औरों को दबा के अपने आप को आगे बढ़ा सकता है। ईरान में जो सुप्रीम लीडर हैं आज की डेट में आया

खामनाई वो उनका कंप्लीट कंट्रोल है। जब रेवोल्यूशन हुआ था ईरान में बहुत सारे मिलिट्री लीडर्स ने आया खुमेनी जो उस टाइम आए थे उनको सपोर्ट किया था। लेकिन बहुत सारे मिलिट्री के ऑफिसर्स के ऊपर शक था कि वो शाह की फौज के थे। तो वो कभी ना कभी हो सकता था शक ये था कि वो कभी ना कभी इस्लामिक रेवोल्यूशन को खत्म करने के लिए या फिर आयातुल्लाह के खिलाफ जाकर कुछ ना कुछ कदम उठाएंगे। सो अयातुल्लाह खमे जब आए 1979 में ईरान और उन्होंने अपनी इस्लामिक सरकार बनाई उस सरकार ने धीरे-धीरे एक सिस्टमेटिक तरीके से बहुत सारे ईरानियन आर्मी ईरानियन एयरफोर्स ईरानियन नेवी के ऑफिसर्स को साइडलाइन करना शुरू किया। बहुतों को अरेस्ट करके जेल में डाला और बहुतों को फांसी पर भी चढ़ाया और एक नई तरह की सेना बनाई जिसका नाम रखा आईआरजीसी जिसका हम बार-बार नाम सुनते हैं जिसको अमेरिका टेररिस्ट ऑर्गेनाइजेशन भी कहता है जिनके लीडर को

अभी मारा है इजराइल ने अपनी स्ट्राइक में आईआरजीसी क्या हुआ इस्लामिक रेवोल्यूशनरी गार्ड कोर नाम से ही आपको अंदाजा लग जाए कि क्या है इनकी जिम्मेदारी देश बचाने की नहीं है इस फौज की जिम्मेदारी है इस्लामिक रेवोल्यूशन को बचाने की यह डायरेक्ट इनका जो चीफ होता है वो डायरेक्ट सुप्रीम लीडर अपॉइंट करते हैं और वह डायरेक्ट सुप्रीम लीडर को रिपोर्ट करते हैं। यानी अगर कोई आईआरजीसी का कमांडर है तो वह प्रेसिडेंट पेजिशियन को नहीं मानेगा अपना लीडर। वो सिर्फ सुप्रीम लीडर आयातुल्लाह खामिनाई की तरफ जवाबदेह है। प्रेसिडेंट की तरफ जवाबदेह नहीं है। सलू्यूट जरूर करेंगे लेकिन जवाबदेही नहीं है उनके प्रेसिडेंट की तरफ। ईरान में आज भी एक ईरान की फौज है। ईरान की वायु सेना है। ईरान की जल सेना है। लेकिन आईआरजीसी की अपनी फौज, अपनी वायुसेना, अपनी जल सेना है। ज्यादा अच्छे हथियार उनके पास है। ज्यादा फंडिंग उनके पास है और ज्यादा अच्छी ट्रेनिंग उनके पास है। ईरानियन आर्मी, नेवी, एयरफोर्स उतने अच्छे नहीं है। कोई भी कदम उठाना होता है तो वो आईआरजीसी उठाते हैं। आईआरजीसी के हाथ में सारी बैलस्टिक मिसाइल्स हैं। आईआरजीसी के हाथ में ही न्यूक्लियर वेपन जाएंगे अगर बनते हैं तो। और आईआरजीसी जैसे मैंने कहा सिर्फ रिपोर्ट करता है सुप्रीम लीडर को। यानी ईरान में जो सबसे पावरफुल मिलिट्री ऑर्गेनाइजेशन है उसका

डायरेक्ट कंट्रोल सुप्रीम लीडर के हाथ में है। सुप्रीम लीडर जो कहेंगे वो ये करेंगे। ठीक है? इजराइल की अगर बात करें तो इजराइल भारत जैसा है। इजराइल में जरूरी है कि 18 वर्ष की आयु तक पहुंचते ही हर लड़का हर लड़की जाए और कंपलसरी मिलिट्री सर्विस करें। मिलिट्री सर्विस एक ऐसी चीज है जिससे जैसे एक तरह से आप ये समझिए कि अमूमन 98% जो इजराइल की पापुलेशन है खासकर यहूदियों के बीच वो मिलिट्री सर्विस करके निकलते हैं जिससे एक भाईचारा बढ़ता है। एक ब्रदर एक कैमरा निकल के आती है। तो अगर आप इजराइल में पॉलिटिक्स में जाना चाहते हैं। जरूरी है कि आप जब अपनी मिलिट्री सर्विस कर रहे हो तो आप कुछ चुनिंदा यूनिट्स में जाने की कोशिश करें। खासकर कमांडो बटालियंस में जाने की कोशिश करें। स्पेशल फोर्सेस में जाने की कोशिश करें। यही है जो सबसे जोखिम वाले मिशनंस करते हैं। और यही लोग हैं जो रिटायर होने के बाद इजराइल की जो स्टेट है जो सिस्टम है चाहे वो एडमिनिस्ट्रेशन हो, फॉरेन पॉलिसी हो, अर्थव्यवस्था हो, स्टार्टअप्स हो, इन्हीं स्पेशल फोर्सेस और कमांडो यूनिट्स के लीडर्स सब टॉप पर हैं। अगर आप इनमें से नहीं है तो बहुत मुश्किल है आपके लिए इजराइल के स्टेट के अंदर टॉप तक पहुंचना। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि आर्मी सरकार के खिलाफ चली जाएगी। आर्मी की अपनी इंडिपेंडेंस

जरूर है। आर्मी के लीडर्स कई बार क्रिटिसाइज करते हैं। बहुत बुरी तरह आलोचना करते हैं डिफेंस मिनिस्टर की, सरकार की पॉलिसीज की। लेकिन इंडिया की तरह ही आर्मी कभी भी प्राइम मिनिस्टर या प्रेसिडेंट के खिलाफ जाकर किसी तरह का न्यूक्लियर अटैक या किसी भी तरह का अटैक या मिशन नहीं करेंगे।

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