चाबहार घेरने की गलती कर बैठा अमेरिका, अब INS विक्रांत उतरेगा मैदान में!
दोस्तों, क्या वाकई डॉन्ड ट्रंप ने भारत की खामोशी को उसकी कमजोरी समझने की सबसे बड़ी गलती कर दी है? खबरें कह रही हैं कि वाशिंगटन के ओवल ऑफिस से निकले एक फैसले ने हिंद महासागर की लहरों में तनाव की नई कहानी लिख दी है। जी हां, ट्रंप के एक आदेश ने उस रणनीतिक दरवाजे को घेरने की कोशिश की है जिसे भारत अपने वैश्विक व्यापार का सबसे अहम रास्ता मानता है। यह दरवाजा है छाबाहार पोर्ट, वही बंदरगाह जो भारत को अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक सीधी पहुंच देता है। लेकिन शायद वाशिंगटन यह भूल गया कि आज का भारत पहले जैसा नहीं है। जैसे ही आधी रात को समंदर की गहराइयों से भारतीय नौसेना के युद्धपोतों की हलचल शुरू हुई, कई देशों के रडार सिस्टम्स पर अचानक गतिविधि बढ़ गई। क्योंकि समुद्र में उतर चुका था
भारत का वह समुद्री दैत्य जिसे दुनिया आईएएस विक्रंट के नाम से जानती है। अमेरिकी नौसेना के कई कमांडर जो अब तक हिंद महासागर को अपना प्रभाव क्षेत्र मानते थे, अचानक सतर्क हो गए। उनके सामने कोई साधारण चुनौती नहीं थी बल्कि भारत की बढ़ती समुद्री शक्ति खड़ी थी। आज सवाल सिर्फ एक पोट का नहीं रह गया है। आज सवाल भारत के स्वाभिमान का है। क्या ट्रंप की नेवी वास्तव में विक्रांत की इस रणनीतिक ताकत के सामने टिक पाएगी? क्या भारतीय नौसेना की मौजूदगी ने अमेरिकी रणनीतिकारों की रातों की नींद उड़ा दी है? दिल थाम कर बैठिए क्योंकि आज हम उस समुद्री टकराव की कहानी खोलने जा रहे हैं जिसकी एक झलक भी अगर पूरी दुनिया तक पहुंच जाए तो वैश्विक राजनीति में हलचल मच सकती है। क्या भारत ने समुद्र में अमेरिका को रणनीतिक तौर पर घेर लिया है। आइए समझते हैं इस पूरी
कहानी को विस्तार से। दोस्तों अगर इस पूरे घटनाक्रम को समझना है तो हमें उस शतरंज की बिसात को देखना होगा जिस पर यह खेल खेला जा रहा है। यह कोई साधारण टकराव नहीं बल्कि महासागरों की रणनीतिक लड़ाई है। दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री रास्तों में से एक ओमान की खाड़ी इन दिनों असामान्य रूप से शांत दिखाई दे रही है। लेकिन अक्सर तूफान आने से पहले ही सबसे गहरा सन्नाटा होता है। और इस बार उस संभावित तूफान का केंद्र बना है वही चाबहार पोर्ट। वाशिंगटन में सत्ता परिवर्तन के बाद डॉन्ड ट्रंप की अमेरिका फर्स्ट नीति ने एक बार फिर वैश्विक राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। खबरें यह इशारा कर रही हैं कि ईरान पर दबाव बनाने की रणनीति के दौरान अमेरिका ने अनजाने में भारत के सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक हित को छू लिया है। चाबहार भारत के लिए सिर्फ एक बंदरगाह नहीं है। बल्कि यह उस रणनीतिक रास्ते की चाबी है जिसके जरिए भारत बिना किसी रुकावट के अफगानिस्तान और मध्य एशिया के बाजारों तक पहुंच सकता है। यही
कारण है कि जब इस क्षेत्र में अमेरिकी नौसैनिक गतिविधियां बढ़ने लगी तो नई दिल्ली के रणनीतिक गलियारों में चिंता की लहर दौड़ गई। रिपोर्ट्स के अनुसार अमेरिकी नौसेना ने ओमान की खाड़ी में अपनी पेट्रोलिंग को काफी बढ़ा दिया है। यही वह इलाका है जहां से भारतीय व्यापारिक जहाज चाबहार की ओर जाते हैं। जब कुछ भारतीय जहाजों को अमेरिकी युद्धपोतों की ओर से रेडियो चेतावनी मिली तो दिल्ली में बैठे रणनीतिकारों को समझ आ गया कि मामला अब केवल कूटनीतिक नहीं रह गया है। लेकिन शायद वाशिंगटन को यह अंदाजा नहीं था कि भारत का जवाब कितना तेज और कितना निर्णायक हो सकता है। जैसे ही अमेरिकी फिफ्थ फ्लट की गतिविधियां बढ़ी, भारतीय नौसेना के मुख्यालय से एक गुप्त संकेत जारी हुआ। ऑपरेशन स्तर पर तुरंत तैयारियां शुरू हो गई और बिना किसी बड़े ऐलान के समुद्र में भारतीय युद्धपोतों की गतिविधि बढ़ने लगी। कुछ ही समय में भारतीय नौसेना का सबसे आधुनिक विमान वाहक पोत विक्रांत अपनी पूरी स्ट्राइक फ़ोर्स के
साथ अरब सागर से होते हुए ओमान की खाड़ी की दिशा में बढ़ता दिखाई दिया। यह केवल दो नौसेनाओं की आम तैनाती नहीं थी। यह उस रणनीतिक संदेश की शुरुआत थी जो भारत दुनिया को देना चाहता था। जैसे ही विक्रांत ने अपने उन्नत रडार सिस्टम सक्रिय किए, समुद्र में मौजूद कई विदेशी जहाजों के सिस्टम पर चेतावनी संकेत दिखाई देने लगे। रिपोर्ट्स यह भी बताती हैं कि इस मिशन में भारतीय नौसेना के कुछ घातक युद्धपोत भी साथ थे, जिन पर अत्याधुनिक मिसाइल सिस्टम तैनात थे। यह साफ संकेत था कि भारत अपने समुद्री हितों की रक्षा के लिए पूरी तरह तैयार है। अब सवाल यह है कि आखिर अमेरिका ने ऐसा कदम क्यों उठाया जिससे यह तनाव पैदा हुआ? इसके पीछे सिर्फ ईरान की नीति ही कारण नहीं मानी जा रही। कई विशेषज्ञों का मानना है कि
वैश्विक सप्लाई चेन और ऊर्जा मार्गों पर नियंत्रण की रणनीति भी इसके पीछे काम कर रही है। अमेरिका चाहता है कि समुद्री व्यापार के महत्वपूर्ण रास्तों पर उसका प्रभाव बना रहे। लेकिन भारत जो अब दुनिया की सबसे तेजी से उभरती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। उसने साफ कर दिया है कि उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा और व्यापारिक हित किसी बाहरी दबाव से तय नहीं होंगे। और यहीं से शुरू होता है उस समुद्री जवाब का अगला अध्याय जिसमें भारतीय नौसेना ने सिर्फ अपनी मौजूदगी से ही यह संकेत दे दिया कि हिंद महासागर अब किसी एक शक्ति का क्षेत्र नहीं रह गया है और यही वह पल था जब इस पूरे टकराव की कहानी और भी रोमांचक मोड़ लेने वाली थी। जब समुद्र में यह तनाव लगातार बढ़ रहा था, उसी समय दुनिया की कई ताकतें इस पूरे घटनाक्रम को बहुत ध्यान से देख रही थी। एक तरफ यूनाइटेड स्टेट्स अपनी नौसैनिक ताकत के दम पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहा था तो दूसरी तरफ इंडिया ने बिना को
ई बड़ा ऐलान किए ऐसी रणनीति अपनाई जिसने पूरे क्षेत्र की स्थिति बदल दी। भारतीय नौसेना की गतिविधियां अचानक तेज हो गई और समुद्र में कई महत्वपूर्ण युद्धपोतों की तैनाती की खबरें सामने आने लगी। यह साफ संकेत था कि भारत अपने समुद्री हितों और व्यापारिक रास्तों की सुरक्षा को लेकर किसी भी तरह का जोखिम लेने के लिए तैयार नहीं है। जैसे ही यह जानकारी सामने आई कि आईएएस विक्रांत ओमान की खाड़ी की दिशा में बढ़ रहा है। कई अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों ने इसे एक बड़ा रणनीतिक संदेश माना। विक्रांत सिर्फ एक विमान वाहक पोत नहीं बल्कि भारत की बढ़ती सैन्य शक्ति का प्रतीक है। इसके डेक से उड़ान भरने वाले लड़ाकू विमान और इसके साथ तैनात मिसाइल सिस्टम किसी भी संभावित खतरे को रोकने की क्षमता रखते हैं। समुद्र के बीचों-बीच यह एक ऐसा तैरता हुआ सैन्य अड्डा है जो हजारों किलोमीटर दूर तक अपनी शक्ति का प्रभाव दिखा सकता है। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती।
विक्रांत के साथ-साथ भारतीय नौसेना के कई घातक युद्धपोत भी सक्रिय हो चुके थे। इन्हीं में से एक था आईएएस ट्राइकंड जिसे भारतीय नौसेना का एक बेहद आधुनिक और खतरनाक स्टेल्थ फ्रिगेट माना जाता है। यह युद्धपोत दुश्मन के रडार से बचते हुए बहुत करीब तक पहुंच सकता है और जरूरत पड़ने पर सटीक हमला करने की क्षमता रखता है। जब इस जहाज की मौजूदगी की खबर सामने आई तो कई विदेशी सैन्य विश्लेषकों ने इसे भारत की रणनीतिक तैयारी का संकेत बताया। इसी बीच एक और बड़ी खबर सामने आई जिसने इस पूरे घटनाक्रम को और भी गंभीर बना दिया। रिपोर्ट्स के अनुसार भारतीय नौसेना का दूसरा विमान वाहक पोत आईएएस विक्रमादित्य भी अरब सागर की दिशा में सक्रिय हो चुका था। जब किसी देश के पास एक साथ दो विमान वाहक
पोथ समुद्र में ऑपरेशन करने की क्षमता होती है तो उसे ट्विन कैरियर ऑपरेशन कहा जाता है। दुनिया में बहुत कम देश ऐसे हैं जो इस तरह की सैन्य क्षमता रखते हैं। यही वह क्षण था जब कई रणनीतिक विशेषज्ञों ने माना कि समुद्र में शक्ति संतुलन तेजी से बदल रहा है। एक तरफ अमेरिकी नौसेना की ताकत थी। लेकिन दूसरी तरफ भारतीय नौसेना का यह संयोजन भी कम खतरनाक नहीं था। विक्रांत और विक्रमादित्य के साथ तैनात डिस्ट्रयर्स और फ्रिगेट्स मिलकर एक ऐसा सुरक्षा घेरा बना सकते थे जिसे पार करना किसी भी नौसेना के लिए आसान नहीं होता। इस पूरे ऑपरेशन का असली उद्देश्य युद्ध शुरू करना नहीं बल्कि एक स्पष्ट संदेश देना था। भारत यह दिखाना चाहता था कि वह अपने रणनीतिक हितों और समुद्री व्यापारिक रास्तों की रक्षा के लिए पूरी तरह सक्षम है। समुद्र में मौजूद भारतीय जहाजों की तैनाती को कई विशेषज्ञों ने डेट्रिंस स्ट्रेटजी कहा जिसका मतलब होता है अपनी शक्ति का ऐसा प्रदर्शन जिससे सामने वाला कोई आक्रामक कदम उठाने से पहले कई बार सोचे। समुद्र के नीचे भी स्थिति उतनी ही दिलचस्प थी। रिपोर्ट्स के अनुसार भारतीय नौसेना की कुछ पनडुब्बियां भी इस क्षेत्र में सक्रिय थी।
पानी के नीचे चलने वाली यह पनडुब्बियां किसी भी युद्धपोत के लिए सबसे बड़ा खतरा मानी जाती हैं क्योंकि इन्हें ढूंढ पाना बेहद मुश्किल होता है। यही वजह है कि जब किसी क्षेत्र में पनडुब्बियों की मौजूदगी की आशंका होती है तो बड़े-बड़े युद्धपोत भी बहुत सावधानी से आगे बढ़ते हैं। इस पूरे घटनाक्रम ने दुनिया को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्या वास्तव में हिंद महासागर में शक्ति संतुलन बदल रहा है? कई विशेषज्ञों का मानना है कि पिछले कुछ वर्षों में भारत ने अपनी नौसैनिक ताकत को जिस तेजी से मजबूत किया है, उसने वैश्विक रणनीतिक समीकरणों को प्रभावित करना शुरू कर दिया है। आखिरकार इस तनाव का असर कूटनीतिक स्तर पर भी दिखाई देने लगा। कई देशों ने यह महसूस किया कि अगर स्थिति और ज्यादा बिगड़ती है तो इसका असर वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति पर भी पड़ सकता है। इसलिए बातचीत और कूटनीतिक संपर्कों का दौर तेज हो गया। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बात साफ कर दी कि आज का भारत केवल जमीन पर ही नहीं बल्कि समुद्र
में भी अपनी रणनीतिक क्षमता को तेजी से बढ़ा रहा है। हिंद महासागर जो कभी केवल कुछ चुनिंदा शक्तियों के प्रभाव क्षेत्र में माना जाता था। अब धीरे-धीरे एक नए संतुलन की ओर बढ़ रहा है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल अभी भी बाकी है। अगर भविष्य में इसी तरह के हालात फिर से पैदा होते हैं तो क्या दुनिया की बड़ी शक्तियां भारत की इस बढ़ती समुद्री ताकत को उसी तरह स्वीकार करेंगी या फिर हिंद महासागर में रणनीतिक प्रतिस्पर्धा और भी तेज होने वाली है।


