इसकी जो ऑप्टिक्स है मौसमी जी कि अगर नरवणी की अनपब्लिश्ड किताब जिसको मुझे पता नहीं राहुल गांधी कहां से उसकी एक कॉपी छपवा करके ले आए आपके पास बेहतर कहानी होगी उसका हार्ड बाउंड कवर के साथ वो उस प्रधानमंत्री को देते हुए नजर आते तो राजनीतिक तौर पर एक खराब ऑप्टिक्स में तो प्रधानमंत्री दिखाई देते अगर आप देख सीक्वेंस ऑफ इवेंट्स जो आप बोल रहे हैं कि जनरल नरवाने की किताब को लेकर राहुल गांधी दूसरे दिन आए। उससे पहले एक दिन पहले मैंने ही राहुल गांधी से जब वो बोल रहे थे और उनको बोलने नहीं दिया गया। तब उन्होंने बोला कि मैंने कहा कि आप कह दीजिए जो आपको अंदर नहीं कहने दिया गया। आप बाहर ही कह दीजिए। तब राहुल गांधी ने उसके बाद बोला हां वो तो होगा।
और उसके बाद दूसरे दिन वो वो किताब ले आते हैं जो मेरे सूत्र बताते हैं कि शायद उनको राइटर से ही वो किताब उन्होंने सोर्स की थी। हालांकि वो किताब दिखाने के लिए या किसी को देने के लिए नहीं थी। पर कांग्रेस के सूत्रों के मुताबिक राहुल गांधी के पास ऐसी परिस्थिति बन गई कि उनको बोलने ही नहीं दिया कि किताब में क्या लिखा है और इसलिए उनको वो किताब ले आनी पड़ी जो उनको खुद लेखक से मिली। आप जनरल नरमणी से मिली। आप ऐसा कह रही हैं। जी मुझे ये बताया गया कि लेखक से ही उनको किताब मिली थी और उन्होंने उस किताब को पढ़ा हुआ था।
काफी बारी वो उस बात की का रेफरेंस इधर उधर दे चुके थे। तो बजट सत्र में उन्होंने उस मुद्दे को उठाने का सोचा। दरअसल कुलदीप ये है कि किसी ने भी ये कल्पना नहीं की थी सत्ता पक्ष में और शायद विपक्ष में भी राहुल गांधी की टीम से भी कि राहुल गांधी 50 मिनट तक उसी लाइन पर अड़े रहे। जो लाइन को कोट करना है। अमूमन इंसान नेता जो है आगे बढ़ जाता है कि मुझे बोलने नहीं दिया जाएगा। और वो सिचुएशन ऐसी परिस्थिति बन गई जब बार-बार तीन एडजमेंट्स हुए दूसरे दिन चली गई वो स्थिति और वो स्थिति धीरे-धीरे सरकार के हाथ से बाहर होते हुए नजर आए।
क्योंकि राहुल गांधी ने पूरा स्टेज ले रखा था। अब उसका क्या इंपैक्ट जनता में पड़ता है वो अलग बात है। पर उसका विरोध इस कदर हो गया था। अब ऐसी क्या बात थी जो राहुल गांधी उस आधे लोग को तो पता नहीं को कि कौन सी बात ऐसी थी राजनाथ सिंह और प्रधानमंत्री के बारे में जो राहुल गांधी बोलना चाहते थे जो बोलने उनको नहीं दिया जा रहा था। तो राहुल गांधी ने उसको बतौर दूसरे दिन भी भुनाया और वो किताब ले आ गए। उसके बाद सवाल मामला इसलिए अड़ गया कि जब निशिकांत दुबे छह आठ किताबें ले आ गए तो विपक्ष को लगा कि अब हमारी सुनवाई होगी नहीं और जिस शब्दा जिस शब्दावली का निशिकांत दुबे ने इस्तेमाल किया वो किताबों को दिखाते हुए अय्याश मक्कार ये सब जो मेरे ख्याल से वो एक्सप भी हो गया है जिस शब्द में हिमांशु करेक्ट करेंगे लेकिन जिस शब्दावली का उन्होंने इस्तेमाल किया वो कांग्रेस को बिल्कुल नागवार गुजरा और वो स्पीकर के पास जाते हैं।
कांग्रेस के सांसद स्पीकर के चेंबर में जाते हैं और एक हीटेड डिस्कशन होता है सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच में। अगर बात को बनना था प्रधानमंत्री को थोड़े घंटों बाद बोलना था तो इस तरह की इस तरीके का जो आक्रामक तेवर सत्ता पक्ष के एक ऐसे सांसद की ओर से आया जिसकी बुरी बुरी प्रशंसा प्रधानमंत्री एक ही दिन पहले मीटिंग में करते हैं। तो यही बात प्रियंका गांधी ने बोली कि निशिकांत दुबे वही करते हैं जो सत्ता पक्ष चाहता है। हम और उन्होंने बोला कि अगर और एक बात जो राहुल गांधी ने कह दी थी कि हम किताब देंगे प्रधानमंत्री को। दूसरी बात प्रियंका गांधी ने उसी दो घंटे पहले कह दी कि अगर एलओपी को नहीं बोलने दिया जाएगा तो हम इनको भी नहीं बोलने देंगे। तो यह क्लियर हो गया था कि विपक्ष जो है
बेहद आक्रामक होने वाला है। पर प्रधानमंत्री तो देखिए मलिकार्जुन खरगे साहब जब नारेबाजी कर रहे थे तो राज्यसभा में प्रधानमंत्री ने कहा अपने अंदाज में वो बहुत ही ज्यादा प्रखर वक्ता है। उन्होंने बोला खरगे साहब की उम्र को देखते हुए हमें लगता है कि वो बैठ के नारे लगा ले तो बेहतर है। तो प्रधानमंत्री ऐसी कौन सी सिचुएशन है जो उनके लिए ए्बरेस है? वो उनका इतना बड़ा सियासी को हैंडल कर लेंगे और यही चीज मुझे एक बड़े नेता ने दिन में कही थी यानी कि सुबह तक ये नहीं था तय ये नहीं था कि प्रधानमंत्री नहीं बोलेंगे 5:00 बजे बोलेंगे ये लगातार टीवी चैनलों पे चल रहा था दोपहर को निशिकांत दुबे के बाद बोलने के बाद सिचुएशन बिगड़ी है
और प्रधानमंत्री नहीं बोल ये जब स्पीकर ने कोई कारवाई नहीं की 4 बजे प्रियंका गांधी गई स्पीकर से पूछने के लिए कि आप निशिकांत दुबे पर कारवाई करेंगे तो उन्होंने बोला अभी तक जवाब नहीं आया यह मुझे कांग्रेस के एक सांसद ने बोला कि स्पीकर ने कुछ भी नहीं कहा और स्पीकर इज हेल्पलेस कोर्ट अनकट कांग्रेस एमपी वही महिला एमपी जिन्होंने बाद में हमें इंटरव्यू दिया और हमने मिनटों बाद उन महिला एमपीस का इंटरव्यू किया जो कह रहे थे हम निशिकांत दुबे को बुला रहे थे ए कि निशिकांत दुबे तुमने महिलाओं के बारे में जो बोला है आके हमें बताओ ठीक है
राहुल उस वक्त ना आरएम मैं कंप्लीट कर ना आर एम ना एचएम ना पीएम कोई भी संसद में नहीं आए थे 5:00 बजे के वक्त कोई भी पहली लाइन की पंक्ति में चेयर पे नहीं था और जब तक वो लोग चेयर के पास पहुंचे हाउस अजर्न हो गया हाउस चल शुरू होते ही अजर्न हो गया था और अगर पीएम बोलने वाले होते और परिस्थिति खराब होने वाली होती तो स्पीकर आते स्पीकर साहब नहीं आए थे किसी दूसरे को भेजा था उन्होंने संध्या को जी को चेयर पर तो यानी कि पहले से तय था कि पीएम नहीं आएंगे और पीएम नहीं बोलेंगे।