इजरायल से खतरनाक हथियार की डील पक्की!

इजराइल की संसद में सियासी भूचाल आने वाला है। मंच पर होंगे भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लेकिन कुर्सियों पर छिड़ चुकी है जंग। दरअसल इजराइल के विपक्ष ने बहिष्कार की धमकी दे दी है। तो वहीं सत्ता पक्ष ने चाल भी चल दी है। अगर आप नहीं बैठेंगे तो आपकी सीटों पर कोई और बैठेगा। बता दें कि बुधवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इजराइल दौरे पर जा रहे हैं। उनका संबोधन इजरायली संसद में प्रस्तावित किया गया है। स्वागत की तैयारियां जोर शोर से चल रही हैं। लेकिन इस भव्य आयोजन के पीछे

सियासी टकराव की आग भी लगातार धक रही है। अब सवाल यह उठता है कि आखिर इस पूरे विवाद की जड़ क्या है? तो बता दें कि इजराइल का विपक्ष मांग कर रहा है कि सुप्रीम कोर्ट के प्रेसिडेंट गिटिया अमित को संसद के इस विशेष सत्र में बुलाया जाए। इसराइल में परंपरा रही है कि जब भी कोई विदेशी राष्ट्रीय अध्यक्ष संसद को संबोधित करता है तो संसद के चीफ जस्टिस वहां मौजूद रहते हैं। लेकिन प्रधानमंत्री बेंजमिन नेतन याहू की सरकार जस्टिस अमित को बुलाने के पक्ष में नहीं है। सरकार ने उनके चीफ जस्टिस बनने की

योग्यता पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं और बस यहीं से सियासी तापमान लगातार बढ़ चुका है। तो वहीं बता दें कि विपक्षी चेतावनी भी सामने आ चुकी है और विपक्ष के नेता याई लैपिड ने साफ कह दिया है कि अगर सुप्रीम कोर्ट के प्रेसिडेंट को इस कार्यक्रम में बाहर रखा गया तो विपक्षी सांसद भी बाहर रहेंगे। लैपिड ने आरोप लगाया है कि इससे इजराइल की अंतरराष्ट्रीय छवि को नुकसान होगा। उन्होंने संसद के स्पीकर पर देश को शर्मिंदा करने का आरोप लगाया है और नेतन याू से हस्तक्षेप की मांग भी की। हालांकि संसद के

स्पीकर अमीर ओहाना ने विपक्ष की धमकी को चुनौती मान लिया है। उन्होंने ऐलान किया है कि अगर विपक्ष बहिष्कार करता है तो संसद की सीटें खाली नहीं दिखेंग और योजना साफ है कि पूर्व सांसदों को बुलाया जाएगा और वह बहिष्कार करने वाले सांसदों की सीटों पर बैठेंगे। यानी कैमरों में खाली कुर्सियां नहीं दिखेंगी और संदेश जाएगा कि संसद भरी हुई है। ओहाना ने पलटवार करते हुए यह कहा कि अगर लैपिड एक जरूरी दोस्त और दुनिया की बड़ी ताकत के साथ रिश्तों को नुकसान पहुंचाना चाहते हैं तो यह उनका फैसला है। उन्होंने यह भी याद दिला दिया है कि जब अर्जेंटीना के राष्ट्रपति जेवियर माइली अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप या पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र

मोदी के दौरे के दौरान विशेष सत्र हुए थे तब सुप्रीम कोर्ट प्रेसिडेंट की अनुपस्थिति मुद्दा नहीं बने थे। तो अब सवाल यह उठता है क्या यह परंपरा की लड़ाई है या न्यायपालिका बनाम सरकार की खींचतान अब अंतरराष्ट्रीय मंच पर खुलकर सामने आने वाली है? एक तरफ भारत और इजराइल की कूटनीतिक मजबूती का प्रदर्शन हो रहा है तो वहीं दूसरी तरफ घरेलू सियासत

की तीखी दरार सामने आ रही है। सवाल अब यह उठता है क्या विपक्ष अपनी धमकी पर कायम रहेगा और अगर रहा तो क्या भरी हुई कुर्सियां राजनीतिक सन्नाटे को छिपा पाएंगी? क्योंकि इस बार दाव सिर्फ एक भाषण का नहीं है बल्कि इजराइल की सियासत भी साफ का है।